Saturday, October 08, 2016

सृजनशीलता को पनपने का अवसर दें - Jawaharlal Nehru



Jawaharlal Nehru Prerak Prasang
एक दिन पंडित जवाहरलाल नेहरू अपने अध्ययन कक्ष में बैठे थे। कभी-कभी उनकी दृष्टि किताब से हटकर तीन मूर्ति भवन के प्रांगण की ओर चली जाती। गर्मी का मौसम था - दोपहर का समय, लू चल रही थी। माली अपने घरों में जा छिपे थे। ठीक इस दुपहरी में एक नन्हा बालक आम के वृक्ष के नीचे खड़ा डालियों से लटके आम की ओर एकटक देख रहा था। वह लगातार उछल रहा था। उछल-उछल कर आमों को पकड़ना चाहता था। आम के फल उसकी पहुंच से बाहर थे। उसने एक तरकीब सोची, कुछ दूर पर बड़े-बड़े पत्थर रखे हुए थे। पत्थर के उन टुकड़ों को वह धीरे-धीरे ढकेलते हुए आम के वृक्ष के निकट लाया। कड़े श्रम के बाद एक पत्थर के ऊपर  दूसरा रखकर वह आम को अपने हाथों से पकड़ लेना चाहता था, लेकिन मात्र दो अँगुल से वे ऊपर हो जाते। बेचारा छू नहीं पाता। अंततः उसने तीसरा पत्थर रखा, अब उसकी आँखें आशा से चमक उठी। धीरे-धीरे पत्थरों की ढेर पर उसने पाँव रखें। अब एक आम उसकी हथेली में आने ही वाला था कि पीछे से जोरों की आवाज आई- कौन है बे? आता हूं।

इतना कहना था कि वह पत्थर से फिसल गया और बालक धड़ाम से धरती पर गिर पड़ा। नेहरू जी ने जैसे ही यह दृश्य देखा उन्हें माली पर क्रोध आ गया। किताब ज्यों-की-त्यों रखकर वे प्रांगण में दौड़े और माली को एक मताचा जड़ दिया जो बालक के कान पकड़े हुए था। नेहरू जी माली को पीटते हुए डाँटने लगे और कहा - ''बदमाश तूने बच्चे की मेहनत नष्ट कर दी। दूसरे दिन माली को प्रांगण से निकाल दिया गया।''

दोस्तों, यह छोटा सा प्रंसग हमें जीवन में सृजनशीलता के महत्व को बताता है। जब कोई किसी चीज़ को पाना चाहता या जिस कार्य को करने में उसे आनंद आता हो, चाहे उसे पाना या करना कितना भी कठीन क्यों न हो; वह उससे भागता नहीं बल्कि उस वस्तु को पाने या उस काम को पूर्ण करने के लिए नए-नए तरिकों को इज़ाद करता है क्योंकि उसका मन उसमे रमा होता है। जिस कारण वह सृजन करता है। सृजनशीलता को नष्ट न करे, उसे पनपने दे।
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देश के लिए त्याग हमारा कर्त्तवय है - Rajendra Nath Lahiri


Img Credit:Wikipedia
अमर शहीद नाथ लाहिड़ी को गोंड़ा जेल में सन् 17 दिसम्बर 1927 को फाँसी दी गयी। फाँसी पर चढ़ने के पूर्व उन्होंने नित्य की भाँति स्नान किया, गीता पाठ और व्यायाम किया। उसके बाद अपना वस्त्र धारण कर मजिस्ट्रेट से कहा, 'मैं समझता हूँ, मुझे देर नहीं हुई।' फिर मजिस्ट्रेट के साथ फाँसी घर की बढ़ने लगे। मजिस्ट्रेट यह सब देखकर आवाक था। उसने कहा, 'महाशय लाहिड़ी! आपको यदि आपत्ति न हो, तो एक बात पूछूँ? मैं 45 मिनटों से आप जो कुछ कर रहे थे, देख रहा था। आपने स्नान किया, स्वाभाविक था, गीता पाठ किया, वह भी स्वाभविक था, क्योंकि आप अगली घटना को सहन करने की प्रेरणा ग्रहण करना चाहते होंगे, लेकिन मेरी समझ में यह नहीं आया कि आपने व्यायाम क्यों किया?'

लाहिड़ी ने अत्यन्त शान्ति से कहा, 'आप जानते हैं कि मैं हिन्दू हूं और इसके नाते मेरा यह दृढ़ विश्वास है कि मैं मरने नहीं जा रहा हूँ, बल्कि मैं अपनी मातृभूमि की स्वतन्त्रता के लिए पुनः जन्म लेने जा रहा हूँ और उसके लिए अगले जीवन में बलिष्ठ शरीर चाहिए। इसीलिए मैंने आज भी, फाँसी के पूर्व भी व्यायाम किया। मजिस्ट्रेट इस महान क्रान्तिकारी की वीरता देख आश्चर्यचकित रह गया।'
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स्वयं मत बोलो, कर्म को बालने दो - Vinoba Bhave, Ghanshyam Das Birla



ghanshyam das birla prerak prasang

प्रसंग-1

एक दिन घनश्याम दास बिड़ला अपने कार्यालय जा रहे थे। कार्यालय जाने में देर हो गयी थी। इसलिए ड्राइवर गाड़ी तेज चला रहा था। गाड़ी जैसे एक तालाब के रासते से गुजर रही थी, उसके किनारे सैकड़ों लोगों की भीड़ देखकर बिड़ला साहब ने ड्राइवर से पूछा - 'क्या बात है? इतनी भीड़ क्यों है?' ड्राइवर ने कहा- 'पता नहीं सर, लगता है कोई डूब गया है।'

घनश्याम दास ने तुरन्त गाड़ी रोकने को कहा और जल्दी से अपना दरवाजा खोल दौड़ पड़े। तालाब के निकट जाकर देखा तो हैरान रह गये, एक नौ-दस वर्ष का बालक पानी में डूब रहा है, लोग खड़े होकर बचाओ, बचाओ चिल्ला रहे हैं, लेकिन कोई तालाब में कूद कर बचाने नहीं जाता।

घनश्यामद दास जूता पहने ही पानी में कूद गये। तैरकर बालक को पकड़ा और खींच कर बाहर लाये। उसी भींगे हालत में बालक को लेकर अस्पताल पहुँच गए। बच्चे ने काफी पानी पी लिया था। जब डॉक्टरों ने आश्वासन दिया कि लड़का बच जायेगा, तभी वे अपने कार्यालय पहुंचे। उन्हें इस हालत में देखकर सभी कर्मचारी आवाक् रह गये। जब उन्होंने सुना कि बिड़ला जी ने किस तरह उस लड़के की जान बचायी, उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए कहा- 'सर, आप तो महान है।' बिड़ला जी ने कहा- 'यह तो हमारा कर्तव्य था।'

प्रसंग-2


विनोबा भावे नित्य सारी चिट्ठियाँ जो आश्रम में आतीं, पढ़ा करते और समय से उत्तर देना नहीं भूलते थे। एकदिन एक आश्रम के वरिष्ठ सदस्य वहाँ बैठे हुए थे। चिट्ठियाँ छाँटते-छाँटते विनोबा ने एक चिट्ठी पढ़ी और कूड़ेदान में डाल दी। उस व्यक्ति ने पूछा - 'आप तो हर पत्र को मन से पढ़ते हैं, इसे आपने थोड़ा पढ़कर कूड़ेदान में क्यों डाल दिया? यह किसका पत्र था जिसे आपने फाड़ डाला।' विनोबा जी ने कहा- 'महात्मा गांधी का पत्र था,' तो आपने बापू का पत्र क्यों फाड़ दिया? विनोबा ने कहा - 'ऐसे ही' उस सज्जन से रहा नहीं गया। उन्होंने उसे कूड़ेदानी से निकालकर जोड़ कर देखा कि क्या लिखा गया है। उसमें महात्मा गांधी जी ने विनोबा की भूरि-भूरि प्रशंसा की थी। उस सज्जन ने कहा- 'यह तो संग्रहणीय था- फाड़ना नहीं चाहिए था, यह तो धरोहर है।'

विनोबा ने सीधे शब्दों में कहा- 'वह पत्र ही क्या जिसमें खाली बड़ाई लिखी हो। यह तो चित्त को गंदा कर देगा, अहंकार उत्पन्न करने वाला है' और फिर मुस्कुराने लगे।
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भाषण का प्रभाव - Madan Mohan Malaviya

Madan Mohan Malaviya Prerak Prasangकालाकांकर के राजकुमार श्री सुरेश सिंह का मालवीय जी के सन्दर्भ में संस्मरण प्रेरणादायक है। उनके ही शब्दों में - 'कैम्बलपुर में शाम को एक सभा का आयोजन किया गया। उस दिन मालवीय जी बोलने के लिए जैसे ही उठे, दर्शकों में से एक वृद्ध मुसलमान सज्जन खड़े होकर बोले, ‘मालवीय साहब, आपसे मेरी एक दरख्वास्त है।' 'कहिये'- मालवीय जी ने नम्रता से कहा। 'क्या आप मुसलमान भाई की एक दरख्वास्त कबूल करेंगे?' वृद्ध सज्जन ने फिर प्रश्न किया। 'क्यों नहीं, आप बतलाइए तो सही‘ ‘तो फिर एक मुसलमान भाई यह अर्ज करता है कि आज आप यहाँ तकरीर न करें।' वृद्ध मुसलमान ने कहा। सभा में सनसनी फैल गयी। हम लोग भी आवाक् रह गये। सहसा मालवीय जी की गम्भीर वाणी गूँज उठी। वे बोले, 'भाईयों! आज मैं आप को खितमत में बहुत जरूरी बात करने आया था, लेकिन हमारे एक मुसलमान भाई का हुक्म है कि मैं आपसे कुछ अर्ज न करूँ। मैं नहीं जानता कि किस वजह से हमारे ऊपर इन्होंने पाबन्दी लगा दी है, लेकिन उनका हुक्म तो मानना ही है। अगर हिन्दू लोग मुसलमान भाईयों का हुक्म नहीं मानेंगे, तो हिन्दुओं का कहना मुसलमान कैसे मानेंगे? और जब तक हिन्दू का मुसलमान से प्रेम नहीं रहेगा, तब तक भाइयों में मेल नहीं होगा। हम लोग स्वराज्य कैसे पा सकते हैं? हम अपने देश की आजादी कैसे हासिल कर सकते हैं?'



मुसलमान सज्जन फिर खड़े होकर मालवीय जी को बोलने से रोकना ही चाहते थे कि मालवीय जी ने उन्हें बैठने का इशारा करते हुए कहा, ''आप ही की बात कर रहा हूँ।' हाँ भाईयों, एक मुसलमान तो भारत माता की दो आँख हैं। मुसलमान छोटे भाई हैं और हिन्दु बड़े। छोटा भाई यदि कोई बात गलत भी कहता है और जिद करता है, तो बड़ा भाई उसको मान लेता है। उसी में उसका बड़प्पन है और यही हर एक परिवार में होता है। बिना इसके एकता नहीं और बिना हिन्दु-मुस्लिम एकता के, बिना भाई-भाई के प्रेम के, आज़ादी कैसे मिल सकती है। मुसलमान सज्जन फिर खड़े हुए, लेकिन मालवीय जी ने फिर उसी तरह बैठने का इशरा करके कहा, 'आप ही की बात कह रहा हूं।' और हिन्दु-मुस्लिम एकता पर फिर उनका भाषण चलने लगा। उस दिन मालवीय जी सवा घण्टे बोले। हिन्दु-मुस्लिम एकता पर उनका अपूर्व व्याख्यान था।
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सबको एक ही लाठी से नहीं हाँकें Akbar-Birbal

akbar biral prerak prasang

अकबर के राज्य में एक रात तीन व्यक्ति चोरी करते पकड़े गये। दरबार में उनकी पेशी हुई। पहला अपराधी बादशाह अकबर के सामने लाया गया। अकबर ने उसकी ओर देखा। उसने पूछा - ‘क्यों जी यही सब करते हो ? लज्जा नहीं आती।‘ उन्होंने उसे छोड़ देने का आदेश दिया।

अब कोतवाल दूसरे अपराधी को पकड़कर लाया। अकबर ने आदेश दिया- इसे दस कोड़े पीठ पर लगाओ। उसे दस कोड़े लगे। वह चिल्लाने लगा, फिर आदेश हुआ-अब इसे छोड़ दो।

फिर तीसरा अपराधी लाया गया। बादशाह ने हुक्म दिया - इसका सिर मुण्डन कराओ, चूने से इसके सिर को पोतो और गधे पर चढ़ाकर पूरे नगर में घुमाओ।

वैसा ही किया गया। बीरबल तो सब कुछ जानते ही थे, फिर भी पूछा- 'हुजूर! तीनों अपराधी एक ही चोरी में पकड़े गए थे, फिर भी इन्हें अलग-अलग सजा क्यों हुई?' बादशाह ने कहा- 'खुद आप इसकी जाँच कर लें कि तीनों व्यक्ति अभी क्या कर रहे हैं?' खुफिया सिपाही नगर में दौड़े और उन्होंने आकर खबर दी। उन्होंने कहा - 'हुजूर! यह तो गजब हो गया, जिस पहले आदमी को बिना सजा के छोड़ा गया था उसने आत्महत्या कर ली है। दूसरा व्यक्ति घर में बंद होकर रो रहा है और तीसरा नुक्कड़ पर पान खाकर ठहाके लगा रहा था, कह रहा था फिर चोरी करनी है, इस राज्य में कोई सजा नहीं मिलती।'

सभी दरबारी यह सुनकर बादशाह के न्याय की प्रशंसा करने लगे।
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