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कोहरा...ठण्ड और चाय की चुस्कियों में घुली यादें...

दिसंबर तुम्हारे लिए हमेशा खुशियाँ लेकर आता था. तुम्हें दिसंबर से प्यार था ये हम सब जानते थे. दिसंबर के आते ही तुम खुश हो जाया करती थी. बेसब्री से इंतजार रहता था तुम्हें दिसंबर की पहली सुबह का. हाँ लेकिन जितना खुश तुम दिसंबर के आने पे होती थी, उतनी ही उदास तुम ये बात सोच कर हो जाया करती थी कि ये दिसंबर सिर्फ इकत्तीस दिनों में वापस चला जाएगा. मुझसे अकसर कहती थी तुम, कि जो तुम अगर दिसंबर के दिन बढ़वा दो तो दुनिया की सारी दौलत तुम्हारे नाम कर दूँगी.

तुम्हें सर्दियों में सुबह पार्क में टहलना अच्छा लगता था. सुबह के कोहरे में सड़कों पर चलना तुम्हें पसंद था. गर्मियों की सुबह जब लोग चार पाँच बजे जाग कर टहलने निकलते थे, तुम देर तक सोयी रहती थी लेकिन सर्दियों की सुबह जब सारे लोग रज़ाई में दुबके सोये रहते थे, तुम जाग जाया करती थी और मुझे ना चाहते हुए भी तुम्हारे साथ जागना पड़ता था. कितनी मिन्नतें करता था मैं तुमसे, कि सर्दियों में मुझे देर तक सोने दो, लेकिन तुम तो बस हुक्म दे दिया करती थी... एक घंटे में मिलो पार्क में. 
सुबह की शुरुआत हमारी उसी पार्क से होती थी, वो पार्क जो हमारे मोहल्ले का सबसे बड़ा पार्क था और जहाँ आते हुए हमेशा मुझे इस बात का डर रहता था कि कहीं मुझे किसी ने तुम्हारे साथ देख लिया तो? वैसे इसकी ज्यादा चिन्ता नहीं थी, सर्दियों में इतनी सुबह लोग भी कम आते थे, और मैं ख़ास सावधान भी रहता था. हम उस पार्क में पहुँचने वाले सबसे पहले लोगों में से रहते थे. तुम जहाँ टहलने में और बातें करने में मशगूल रहती थी, मैं तुम्हारी बातें सुनने में और आसपास नज़र दौड़ा कर ये देखने में व्यस्त रहता था कि कोई हमें देख तो नहीं रहा है. वैसे कोई जान पहचान वाले लोग भले न देखें, यूँ लोग तो हमें देखते थे ही. मुझे लगता है कि सुबह पार्क में हम दोनों को यूँ घूमते टहलते, बातें करते देख लोग शायद थोड़े हैरान भी होते होंगे, या क्या पता हँसते भी होंगे हम पर. पार्क में आये सभी लोगों में से सिर्फ हम दोनों ही ‘आउट ऑफ़ प्लेस’ लगते थे. एक तुम, जो सज धज कर सुबह आती थी. और दूसरा मैं, लेदर शू, लेदर जैकेट और जींस पहन कर सुबह मॉर्निंग  वाक करने आता था. ये तो तय था कि लोग हमें लवर्स समझते होंगे, वो भी मैड फॉर एच अदर टाइप लवर्स, जो एक दूसरे के लिए इतने पागल हैं कि सर्दियों की सुबह इतनी ठंड में भी पार्क में टहलने आ जाते हैं, हाथों में हाथ डाले टहलते हैं, बातें करते हैं. तुम कितना चिढ़ती थी जब मैं तुम्हें ये बात कहता था, कि देखो वे सारे हमें लवर्स समझते हैं. तुम चिढ कर कहती थी “लवर्स? ह्म्म्म...? हाँ यही समझते होंगे, मोरोन!! दोस्त हैं, ये तो समझते नहीं होंगे कोई”. बोल के तो देखे कोई लवर्स हमें, मेरे सामने... उसका जबड़ा  न तोड़ दूँ फिर कहना.. ये बोलते ही तुम सच में अपने मुक्के को दिखाती थी मुझे जिससे मैं डर जाता था. तुम्हारा कोई भरोसा भी कहाँ था, मजाक में ही सिर्फ ये दिखाने के लिए कि तुम्हें मुक्के चलाना आता है, कितनी  बार मुझपर बॉक्सिंग कर चुकी हो तुम.
उसी पार्क के पीछे वाला  गेट जो हनुमान मंदिर के तरफ खुलता था  वहाँ इम्तियाज चचा की चाय दुकान थी. सुबह टहलने आये सभी बुजुर्ग, महिलाएं और लड़के लड़कियाँ  वहाँ सुबह की पहली चाय पीते थे. हर सुबह उनके दुकान खुलने से पहले हम दोनों वहाँ पहुँच जाते थे. इम्तियाज चचा भी हमें पहचान गए थे. वो अकसर सुबह हमें देखकर एक ही बात दोहराते थे, मुझसे हँसते हुए कहते, ये लड़की मेरे दुकान के जागने से पहले जाग जाती है और चली आती है चाय पीने”. चचा की इस बात पर तुम चचा से कहती “सिर्फ आपके दुकान से पहले नहीं, इस लड़के और इस शहर से भी पहले मैं जाग जाती हूँ. यकीन न आये तो पूछ लीजिये इससे. मुझसे तो बड़ा परेशान रहता है ये लड़का. 
चचा हँसने लगते थे और उनके साथ मैं भी.
सच कहूँ तो मैं तुमसे परेशान तो बिलकुल नहीं था. तुमसे भला कभी परेशान हो सकता था मैं? लेकिन हाँ हर सुबह की तुम्हारी ये जिद कि पार्क में मिलना है, टहलना है, कोहरे में घूमना है, इस वजह से घर पर अकसर मुझे अजीब सिचुएशन का सामना करना पड़ता था. 
तुम तो तुम थी. बात मानना तो दूर, अपनी मर्ज़ी का करती थी. उन दिनों जबकि हम दोनों के पास मोबाइल फ़ोन था, तुम फिर भी मुझे हर सुबह लैंडलाइन फोन पर ही कॉल कर के जगाती थी. मेरे घर का वो पुराना लैंडलाइन फोन था, उसकी आवाज़ इतनी तेज़ थी कि तुम्हारे कॉल से घर के सभी लोग जाग जाते थे. अकसर पापा मुझे छेड़ने के अंदाज में कह भी देते थे, ये फ़ोन अब हमारे घर का मॉर्निंग  अलार्म हो गया है, ठीक पाँच बज कर पैंतीस मिनट पर ये हम सब को जगाता है.
कितनी बार तुम्हें मैं डांट चुका था कि तुम मेरे मोबाइल पर फोन किया करो. लेकिन तुम मानती कब थी? लैंडलाइन पर फोन करने की तुम्हारी सिर्फ एक वजह होती थी, तुम जानती थी कि ये फोन मेरे बिस्तर के पास वाले टेबल पर रखा होता था और तुम्हें यकीन था कि उसकी रिंग सुनकर मैं जाग जरूर जाऊँगा. मोबाइल का तुम्हें कोई भरोसा नहीं था. दरअसल मोबाइल का भरोसा तो था, लेकिन तुम्हें मेरा भरोसा नहीं था. तुम्हें जाने क्यों अकसर लगता था कि मैं सुबह जागने से बचने के लिए मोबाइल साइलेंट मोड में कर के न सो जाऊँ.
सुबह जब तुमसे मिलकर मैं वापस आता मैं जानता था कि मुझपर कैसे कैसे व्यंग बाण चलने वाले हैं, वापस आते ही पापा का सवाल होता “इतनी सुबह सुबह किसका फोन आता है आजकल? और फ़ोन के आते ही हड़बड़ाए हुए से कहाँ निकल जाते हो? पापा के ये पूछते ही, पीछे से माँ भी चुटकी लेने में देर न करती... “सुबह सुबह और कहाँ जाएगा? जॉगिंग करने ही जाता होगा...है न?” उधर से बहन बोलती “हाँ, वो बात तो है, लेकिन सुबह सुबह जॉगिंग करने लेदर शू, जीन्स और जैकेट पहन कर भाई क्यों जाता है? पापा भी एक आखिरी  तीर छोड़ते, “तो गर्मियों में भी किया करो जॉगिंग. सेहत के लिए अच्छा होता है न. गर्मियों के सुबह तो तुम घर से निकलते नहीं हो...”
सिर्फ इस एक वजह से तुम्हें जाने कितनी बार कह चुका था मैं, तुम सुबह की अपनी ये जिद छोडो, शाम में तो हम रोज़ मिलते हैं. मुझे घर में कितने सवालों का सामना करना पड़ता है मालूम भी है तुम्हें?
लेकिन तुम्हें मेरी इस बात से ज़रा भी फर्क नहीं पड़ता. तुम कहती “तुम बेशक परेशानियों का सामना करते रहो, लेकिन सुबह की चाय और पार्क में टहलने के वक़्त में कोई बदलाव नहीं होगा”. हाँ, वन्स इन अ ब्लू मून तुम्हें मुझपर दया आती या किसी दिन तुम मुझपर जरूरत से ज्यादा मेहरबान रहती तो कहती... “चल शॉपिंग पर चलते हैं, तुम्हारे लिए ट्रैक सूट और जूते खरीद लाती हूँ, फिर तो कोई सवाल नहीं पूछेगा न कि सुबह कहाँ जाते हो? तुम कह सकते हो बेझिझक कि जॉगिंग पर जाते हो, या इवन बेटर, आंटी से मैं बात करती हूँ, कहती हूँ कि रोज़ हमारी मॉर्निंग डेट होती है, आप प्लीज सवाल न पूछा कीजिये इससे”. 
नो  वे. मैं गुस्से में कहता. 
तुम समझ जाती थी कि तुम्हारी जीत हुई है और तुम मुस्कुराने लगती. मुझे मनाते हुए कहती, बस अप्रैल भर तो तुम्हें सुबह परेशान करूँगी मैं.. उसके बाद कहाँ? 
हम दोनों का हर दिन का कमोबेश यही शिड्यूल रहता था, कम से कम सुबह का शिड्यूल तो यही था, एकदम फिक्स्ड. बिना किसी बदलाव के. हाँ कभी कभी इस शिड्यूल में तुम या मैं एक दूसरे को सर्प्राइज़ देने के लिए थोड़ा बदलाव कर देते थे. जैसे की उस दिन हुआ था, वो जो तुम्हारे जन्मदिन की सुबह थी और उस दिन सुबह के शिड्यूल में बदलाव मैंने किया था. 
तुम्हारे जन्मदिन की सुबह की प्लानिंग मैंने दो दिन पहले से कर रखी थी जिसकी तुम्हें कोई खबर नहीं थी. तुम तो अपने जन्मदिन की सुबह भी बेखबर सोयी हुई थी. एक शाम पहले जो मैंने तुमसे कह दिया था कि सुबह आना मेरा मुमकिन नहीं है घर में कुछ काम है. तुम उदास तो बहुत हो गयी थी क्योंकि वो तुम्हारे जन्मदिन की सुबह थी और तुम चाहती थी कि मैं तुम्हारे साथ रहूँ. लेकिन घर पर काम की बात सुनकर तुमने भी कोई जिद नहीं की थी. 
उस सुबह ठीक साढ़े पाँच बजे मैंने तुम्हें फोन किया था. 
तुम गहरी नींद में थी. तुमने नींद में ही फोन रिसीव किया, दूसरी तरफ मैं था. फोन पर तुम्हारे लिए सड़क किनारे चाय दुकान पर खड़ा होकर फोन पर हैप्पी बर्थडे सॉंग गा रहा था, बिना इस बात की परवाह किये हुए कि आसपास वाले लोग देखेंगे मुझे, यूँ गाते सुनेंगे तो क्या सोचेंगे. और जिसके लिए मैं ये जन्मदिन का गाना गा रहा था, वो समझ रही थी कि वो कोई सपना देख रही है. हाँ मैडम, आपने उस सुबह यही तो समझा था.. कि आप कोई सपना देख रही हैं. “तुम यार सपने में इतने बेसुरे नहीं सुनाई देते..” यही इग्ज़ैक्ट शब्द थे जो तुमने उस सुबह नींद में कही थी मुझसे और जिसके वजह से तुम्हें जाने कितने समय तक मैं छेड़ता रहा था.. “तुम्हें तो मेरी आवाज़ बेसुरी लगती है..” और तुम जाने कितनी बार इस एक बात के लिए मुझसे माफ़ी माँग चुकी थी... “अरे यार मैं नींद में थी न...” 
तुम नींद में वैसे अकसर बातें करने लगती थी. रात में तो लगभग तुम्हारी आदत थी ये, तुम बातें करते हुए सो जाया करती थी.. कब तुम्हें नींद आ जाती थी ये तुम्हें खुद पता नहीं होता था, और तुम नींद में ही मुझसे बातें करते रहती थी. तुम्हारे कितने राज़ की बातें मैंने इस तरह ही तो जाना था. 
उस सुबह भी तुम नींद में थी और मुझसे बातें कर रही थी.. तुम्हें मैं नींद से जागने के लिए, उठने के लिए, बाहर आने के लिए फोन पर कह रहा था, और तुम समझ रही थी कि तुम फिर से कोई सपना देख रही हो.. और नींद में ही मुझसे बार बार कह रही थी.. “चुप भी रहो प्लीज, सुबह यूँ आर्डर देने का काम मेरा है. तुम क्यों मुझे आर्डर दे रहे हो और वो भी सपने में. मैं सोयी हुई हूँ अभी”. 
बड़ी मेहनत करनी पड़ी थी उस दिन तुम्हें ये यकीन दिलावाने के लिए कि मैं सच में तुम्हारे अपार्टमेंट के गेट के बाहर खड़ा हूँ. नींद में ही तुम चलते हुए अपनी खिड़की के पास आई थी, और जब मुझे तुमने खड़े देखा तब तुम्हें सच में यकीन आया था कि मैं तुम्हारे घर के बाहर खड़ा हूँ. 
किस तरह से तुम भागते हुए नीचे आई थी, कितनी हड़बड़ी में और आते ही कैसे मुझपर बरस पड़ी थी. “मरवा दिया था तुमने, ऐसे कोई शार्ट नोटिस देता है क्या? जानते भी हो कैसे आई हूँ मैं? माँ से बोलना पड़ा कि रश्मि ने अचानक बुला लिया...तुम सच में पागल हो”. 
मेरा तो मन किया उस वक़्त कि उलटे तुमसे पूछूं, अच्छा बताओ रोज़ सुबह ऐसे मुझे शोर्ट नोटिस देती हो तो मैं कैसे मैनेज करता हूँ? लेकिन वो तुम्हारा जन्मदिन था और मैं चाहता था कि जो भी छोटी प्लानिंग सुबह की मैंने की है उसे तुम एन्जॉय करो. 
तुम्हारा सारा गुस्सा वैसे तो काफूर हो गया था उसी वक़्त जब तुम्हें मैंने नीचे आने पर तुम्हारे ही अपार्टमेंट के गार्डन में खिला गुलाब का वो फूल दिया था, और तुम्हें जन्मदिन की बधाई दी थी. हाँ लेकिन तुम्हारे मन में कई सवाल अब भी उमड़े हुए थे... “तुम आज गाड़ी लेकर क्यों आये हो? और तुम कैसे आये आज? आज तो तुम्हें काम था?” गाड़ी के पिछली सीट पर रखे एक नए बैग को देखकर तुम्हें और आश्चर्य हुआ. ये बैग किसका है? और तुम इसे सुबह क्यों लेकर आये हो? तुम सुबह की बहुत सी बातों से कन्फ्यूज्ड हो रही थी और मैं तुम्हारे इस कन्फ्यूज अवस्था का मजा ले रहा था.
चलो चाय की दुकान पर, वहाँ चाय पीते हैं और तुम्हारे सभी सवालों का जवाब तुम्हें वहीं मिलेगा. मेरे इस जवाब से तुम और कन्फ्यूज हो गयी थी. 
चाय दुकान पहुँच कर तो तुम्हें और भी आश्चर्य हुआ. आमतौर पर इनकी चाय दुकान सुबह खुलती नहीं है, बस एक ठेले पर ये चाय बनाते हैं और हम वहीँ ठेले के पास खड़े होकर चाय पीते थे, लेकिन तुमने देखा कि दुकान खुली थी और बेंचे लगी हुई थीं. ये हो क्या रहा है आज? तुमने मेरी तरफ देखकर कहा था. सुबह से एक के बाद एक हर बात पर तुम्हें आश्चर्य हो रहा था – सुबह यूँ मेरा तुम्हारे घर आ जाना, पीछे वाली सीट पर उस रहस्मयी बैग का होना, और अब ये चाय दुकान का खुला होना, और उसपर भी सबसे बड़ी आश्चर्य की बात थी, चाय दुकान पर गाने बजते रहना... और वो भी तुम्हारी पसंद के गाने और दुकान पर आते ही चचा का तुम्हें जन्मदिन की बधाई देना. 
ये सब मेरे प्लानिंग का ही एक हिस्सा था. मैंने पहले ही शाम में आकर सब समझा दिया था इम्तियाज़ चचा को. सुबह सब मेरे प्लान के हिसाब से हो, इसके लिए मुझे थोड़ी मेहनत करनी पड़ी थी इम्तियाज चचा को मनाने में, लेकिन वो जल्द ही मान गए थे. एक कैसेट मैंने दे दिया था उन्हें जिसमें तुम्हारे पसंद के गाने रिकार्डेड थे.
हम्म...जन्मदिन की सुबह, ड्राइविंग थ्रू द सिटी, ठण्ड, कोहरा, चाय, अ पोसिबल गिफ्ट इन द बैग....अब? अब क्या? तुमने यही पूछा था न मेरे से. 
मैंने तुम्हें जवाब नहीं दिया बल्कि सड़क के तरफ इशारा किया, तुमने उधर देखा.. उधर से हमारे तीन दोस्त, समर, शिवी और अवि आ रहे थे. तुम लगभग ख़ुशी से उछल पड़ी थी, “अरे ये तो सरप्राइज बर्थडे पार्टी हो गयी मेरी...”
हाँ, वो सरप्राईज बर्थडे पार्टी ही थी तुम्हारी जिसे मैंने प्लान किया था. ये सब मैंने दो दिन पहले ही शाम में सोच लिया था, जब तुम अपने स्विट्ज़रलैंड की छुट्टियों के बारे में बता रही थी. वहाँ जिस होटल में तुम रुकी थी, उसके सामने ही एक कैफे था, जो चौबीसों घंटे खुला रहता था, और जहाँ तुम हर दिन सुबह की ठण्ड और कोहरे में कॉफ़ी पीती थी और जहाँ एक सुबह तुमने अपनी छोटी बहन का जन्मदिन सेलिब्रेट किया था. तुम्हारे ऊपर उस सुबह का हैंगोवर अब तक हावी था, और हर शाम तुम उस सुबह का जिक्र करती थी. शायद तब से ही मैंने ये सोचा था कि कुछ ऐसा अपने शहर में करूँगा, तुम जब रहोगी यहाँ.. तुम्हारे जन्मदिन की सुबह. और आज वही सुबह थी. 
मैं खुश था कि  जो मैंने सोचा था वो सब ठीक वैसा ही हुआ. हम पाँच दोस्त, चाय दुकान पर बैठे तुम्हारे जन्मदिन को सेलिब्रेट कर रहे थे. केक जो मैं पहले ही लेते आया था, और मैगी नूडल्स जो चचा की मेहरबानी से सुबह उनके दुकान पर ही बनी थी और चाय. तुम सुबह की इस छोटी सी पार्टी से बहुत खुश थी. “वन ऑफ़ द बेस्ट बर्थडे मॉर्निंग ..” तुमने कहा था. तुम खुश थी, तो मैं भी खुश था. 
हाँ, लेकिन फिर भी एक सवाल तो तुम्हारे मन में अब भी था, कि मेरी गाड़ी के पीछे वाली सीट पर कौन सा बैग रखा है? और वो बैग किसका है? हाँ तुम्हारा वो अंदाज़ा सही था, कि उसमें तुम्हारे लिए तोहफें रखे थे. एक नहीं बल्कि कई सारे तोहफे...एक वूलेन स्कार्फ, ईअररिंग , दो किताबें, एक डायरी, दो फिल्म के सीडी, बहुत से चॉकलेट्स  और मेरी बनाई वो आखिरी पेंटिंग, जिसमें लिखा था.. “Dare to Dream !
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