Tuesday, June 30, 2015

चाँद पर मेला लगायें और देखें

पेड़ पर पानी उगायें और देखें
धूप के कपड़े सिलायें और देखें

ख़ाली-ख़ाली बादलों को छेड़ें चलकर
रेत को पट्टी पढ़ायें और देखें

घुप अन्धेरों से करें कुछ तो ठिठोली
रात भर हल्ला मचायें और देखें

दिल करें है हाथ धो लें जाँ से अपनी
जा के मिट्टी में नहायें और देखें

एक दिन ऐसा करें उड़कर ख़ला1 में
चाँद पर मेला लगायें और देखें

झूल जायें थामकर सूरज की किरनें
जेब में भर लें हवाएँ और देखें

कुछ भी लेकर घर न जायें अबकि 'शाकिर'
प्यार की टॉफ़ी बनायें और देखें

1 ख़ला: शून्य; निर्वात; धरती और आकाश के बीच निर्वात में
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