Tuesday, June 30, 2015

शाम की फ़िक्र में सहर से गया

Evening Scene Shaam ka Manzar

शाम की फ़िक्र में सहर से गया
फिर न लौटा कोई जो घर से गया

जिसने देखा भी आसमान की तरफ़
आज बस वो ही बाल-ओ-पर से गया

ग़म में तल्ख़ी, न आग ज़ख़्मों में
ज़ायक़ा शे'र के हुनर से गया

कट ही जाता है दिन भी शब की तरह
जब से इक ख़ाब चश्म-ए-तर से गया

मालगजी धुँध, रास्ता ठहरी
और यक़ीन दूर राहबर से गया
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