Wednesday, July 01, 2015

आहे-मज़लूम जब अश्कों को हवा देती है

आहे-मज़लूम जब अश्कों को हवा देती है
शीश महल के चराग़ों को बुझा देती है


जब नदी से कभी मैं पानी तलब करता हूँ
तश्नगी को मेरे होंटों से लगा देती है

आग रखती ही नहीं अपने पराये का ख़्याल
उसकी फ़ितरत में जलाना है, जला देती है

मौजे-दरिया भी तो होती है बड़ी वक़्तशनास
क्या इरादा है हवाओं का बता देती है

उसको टूटे हुए दो-चार खिलौने देकर
उसके होंटों पे तब्बसुम को सजा देती है

अब्बा बाज़ार गये हैं अभी कुछ लायेंगे
अपने बच्चे को यह माँ कह के सुला देती है

घर की दहलीज पे रखते ही क़दम ऐ 'इबरत'
ज़िन्दगी मौत का एहसास दिला देती है
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