Wednesday, July 01, 2015

ग़ुबार साफ़ करो आईने की आँखों से

मिटा के ख़ुद को तुम्हें पाना चाहता हूँ मैं
हमेशा अपने ही काम आना चाहता हूँ मैं

अजीब धुन है कि मंज़िल मुझे तलाश करे
सो रास्ते से भटक जाना चाहता हूँ मैं

ग़ुबार साफ़ करो आईने की आँखों से
कि साफ़-साफ़ नज़र आना चाहता हूँ मैं

तेरा मिज़ाज बहुत कुछ बदल गया लेकिन
वहाँ नहीं है जहाँ लाना चाहता हूँ मैं

न अब दरीचा खुलेगा न कोई झाँकेगा
उधर से फिर भी गुज़र जाना चाहता हूँ मैं

यह मसअला भी है मेरी समझ के साथ ‘अक़ील’
कि दूसरों को भी समझाना चाहता हूँ मैं
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