Wednesday, July 01, 2015

हमदर्द बनके आना अचानक मेरे क़रीब

सरमाया-ए-हयात1 मुझे कुछ मिला तो है
महफूज़ मुफ़लिसी में भी मेरी अना2 तो है

हमदर्द बनके आना अचानक मेरे क़रीब
दर पर्दा इस ख़ुलूस3 में कोई दग़ा तो है

दुश्मन है सारा शहर तो इसका नहीं मलाल4
मेरी मदद के वास्ते मेरा ख़ुदा तो है

हमदर्दियाँ नहीं तो चलो तन्ज़5 ही सही
महफ़िल में तेरी आके मुझे कुछ मिला तो है

यह और बात तुन्द6 हवाएँ हों सामने
लेकिन चराग़ अज़्म7 का मेरा जला तो है

छन-छन के आ रही हैं जो किरनें शबाब8 की
चिलमन9 के पीछे कोई यक़ीनन10 छुपा तो है

हिम्मत अगर है मुझमें तो दीदारे-यार कर
कमरे का उसके एक दरीचा11 खुला तो है

'हसरत' विसाल12 उसका मयस्सर13 नहीं मगर
यादों का मेरे दिल में कोई सिलसिला तो है
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