Wednesday, July 01, 2015

मन्ज़र यह दिलनशीं तो नहीं

मन्ज़र यह दिलनशीं तो नहीं दिल ख़राश है
दोशे-हवा पे अब्रे-बरहना की लाश है


लहरों की ख़ामुशी पे न जा ऐ मिज़ाजे-दिल
गहरे समन्दरों में बड़ा इरतिआश है

सोचूँ तो जोड़ लूँ कई टूटे हुए मिज़ाज
देखूँ तो अपना शीशाए-दिल पाश-पाश है

दिल वह ग़रीबे-शहरे-वफ़ा है कि अब जिसे
तेरे क़रीब रहके भी तेरी तलाश है

आँसू मेरे तो ख़ैर वजाहत-तलब न थे
तेरी हँसी का राज़ भी दुनिया पे फ़ाश है

मेरा शऊर जिसकी जराहत से चूर था
तेरे बदन पे भी उसी ग़म की ख़राश है
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