Wednesday, July 01, 2015

तेरे जहान में बेफल शजर नहीं मिलता

तेरे जहान में बेफल शजर नहीं मिलता
बस एक अश्क है जिसका समर नहीं मिलता
Apples
अन्धेरे फैल गये है कुछ ऐसे बस्ती में
चराग़ मिल भी अगर जाये घर नहीं मिलता

मैं रोज़ कितने ही कंकड़ समेट लेता हूँ ना
मगर जो आँख से निकला गुहर नहीं मिलता

कभी तो रेते से भर जाती हैं मेरी आँखें
कभी चराग़ सरे-रहगुज़र नहीं मिलता

हमें कब उसकी तमन्ना नहीं रही ‘अहमद’
बस इस क़दर कि तलब का हुनर नहीं मिलता
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