Wednesday, July 01, 2015

यह तजरिबा हुआ है दुनिया में हमको आकर

यह तजरिबा हुआ है दुनिया में हमको आकर

काँटों से दिल लगाओ फूलों से ज़ख़्म खाकर

हँसिए तो आप लेकिन यह भी नज़र में लाकर
सौ बार रोयिएगा इक बार मुस्कुरा कर

इस अहद के उजाले ने यूँ डसा है उसको
ख़िलवत नशीं हुआ है सारे दिए बुझाकर

जब कुछ नहीं तअल्लुक़ तो दिल के मक़बरे में
यह कौन आ के रखता है इक दिआ जलाकर

बाज़ार गर्म हर-सू है ज़र-परस्तियों का
तू बंदाए-ख़ुदा है तू तो ख़ुदा-ख़ुदा कर

जिस आइने को लेकर तुम ‘आफ़ताब’ उठे हो
मसलूब हो गये सब वह आइना दिखा कर
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