Saturday, June 04, 2016

Gum Shayari mix collection गम पर शायरी संग्रह

Gham Hindi Shayari (Sad Shayari)

ग़म खुद ही ख़ुशी में बदल जायेंगे, सिर्फ मुस्कुराने की आदत होनी चाहिए।
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ग़म में रोता हूँ तेरे सुब्ह कहीं शाम कहीं चाहने वाले को होता भी है आराम कहीं
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बाटने के लियें दोस्त हजारो रखना, जब ग़म बांटना हो तो हमें याद करना..
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मेरा हर पल आज खूबसूरत ह दिल में जो सिर्फ तेरी ही सूरत है कुछ भी कहे ये दुनिया ग़म नहीं दुनिया से ज्यादा हमें तेरी ज़रूरत है
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मेरे हबीब मेरी मुस्कुराहटों पे न जा ख़ुदा-गवाह मुझे आज भी तेरा ग़म है
*** (Sad Shayari)
लज़्ज़ते ग़म बढ़ा दीजिये .. आप फिर मुस्कुरा दीजिये
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मेरी फ़ितरत में नहीं की अपना ग़म बायाँ करू.
..अगर तेरे दिल का हिस्सा हु तो महसूस कर तकलीफ़ मेरी.
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बिछड़ी हुई राहों से जो गुज़रे हम कभी हर ग़म पर खोयी हुई एक याद मिली है
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ख़ुशियाँ तो गिन चुके उँगलियों पे कई बार हम… पर ग़म तो हैं बेशुमार, ईन ग़मों का हिसाब क्या…
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अगर वो पूछ लें हमसे, तुम्हें किस बात का ग़म है तो फिर किस बात का ग़म है,अगर वो पूछ लें हमसे
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तुम्हारे जाने का ग़म ही कम नहीं यूं तो.. तकलीफ़ और भी होती है जब लोग..मुझसे वजह पूछते हैं..!!
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हद से बढ़ जाये ताल्लुक तो ग़म मिलते है. हम इसी वास्ते अब हर शख्स से कम मिलते है..!!
*** (Sad Shayari)
बहुत दिन हुए तुम्हें ठीक से सोचा नहीं पर जब तुम अपने नहीं तो तुम्हें सोचूँ क्यों थोड़ी ख़ुशी मिलेगी और ढेर सारा ग़म
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मंज़िलों के ग़म में रोने से मंज़िलें नहीं मिलती; हौंसले भी टूट जाते हैं अक्सर उदास रहने से
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दो जवाँ दिलों का ग़म दूरियाँ समझती हैं कौन याद करता है हिचकियाँ समझती हैं।
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कोई तेरे साथ नहीं है तो भी ग़म ना कर; ख़ुद से बढ़ कर दुनिया में कोई हमसफ़र नही होता
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हमें कोई ग़म नहीं था„ ग़म-ए-आशिकी से पहले… न थी दुश्मनी किसी से„ तेरी दोस्ती से पहले…!!!
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ग़म–ए–हयात ने आवारा कर दिया वर्ना , थी आरज़ू कि तिरे दर पे सुब्ह ओ शाम करें!
*** (Sad Shayari)
हंसती हुई आंखों में भी ग़म पलते है कौन मग़र झांके इतनी गहराई में
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कोई लश्कर है के बढ़ते हुए ग़म आते हैं… शाम के साये बहुत तेज़ कदम आते हैं…. Bashir Badr
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ग़म-ए-हस्ती का ‘असद’ किस से हो जुज़ मर्ग इलाज शम्अ हर रंग में जलती है सहर होते तक Mirza Ghalib
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शायद खुशी का दौर भी आ जाए एक दिन, ग़म भी तो मिल गये थे तमन्ना किये बगैर…
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ग़म अगरचे जाँ-गुसिल है पे कहाँ बचें कि दिल है ग़म-ए-इश्क़ गर न होता ग़म-ए-रोज़गार होता Mirza Ghalib
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दुनिया ने तेरी याद से बेगाना कर दिया तुझ से भी दिल-फ़रेब हैं ग़म रोज़गार के  Faiz
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भीड़ है बर-सर-ए-बाज़ार कहीं और चलें; आ मेरे दिल मेरे ग़म-ख़्वार कहीं और चलें।
*** (Sad Shayari)
ग़म बढे आते हैं क़ातिल की निगाहों की तरह तुम छिपा लो मुझे ऐ दोस्त गुनाहों की तरह
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मेरी सुबह हो के न हो मुझे..है फिराक़ यार से वास्ता.. शबे ग़म से मेरा मुकाबला..दिले बेकरार से वास्ता..
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है ये मेरी बदनसीबी तेरा क्या कुसूर इसमें,
तेरे ग़म ने मार डाला मुझे ज़िन्दग़ी से पहले।
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ज़िन्दगी लोग जिसे मरहम-ए-ग़म जानते हैं;
जिस तरह हम ने गुज़ारी है वो हम जानते हैं।
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मेरा भी और कोई नहीं है तेरे सिवा ऐ शाम-ए-ग़म तुझे मैं कहाँ छोड़ जाऊँगा !
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ग़म वो मय-ख़ाना कमी जिस में नहीं दिल वो पैमाना है भरता ही नहीं
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अपनी तबाहियों का मुझे कोई ग़म नहीं तुम ने किसी के साथ मोहब्बत निभा तो दी . Sahir
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ग़म-ए-ज़माना ने मजबूर कर दिया वर्ना ये आरज़ू थी कि बस तेरी आरज़ू करते
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किनारों पर रात के.. उभरता है एक ग़म.. लोग कहते चाँद हैं.. मैं कहता बे-रहम..
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खुशीयों की मंजिल ढुंढी तो ग़म की गर्द मिली चाहत के नगमें चाहे तो आहें सर्द मिली दिल के बोझ को दुना कर गया, जो ग़मखार मिला…
*** (Sad Shayari)
न किसी का फेंका हुआ मिले, न किसी से छीना हुआ | मुझे बस मेरे नसीब मे लिखा हुआ मिले, ना मिले ये भी तो कोई ग़म नही | मुझे बस मेरी मेहनत का मिले
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तुम्हें देख न पाने का ग़म नहीं पढ़ लेती हूँ तुम्हें शयरी की तरह
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लोग लेते है यूँ ही………? शमाँ और परवाने का नाम  कुछ नहीं है इस जहाँ में……? ग़म के अफ़साने का नाम_
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दयार-ए-ग़म में दिल-ए-बेक़रार छूट गया सम्भल के ढूंढने जाओ बहुत अँधेरा है Firaq
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वो बड़े ताज्जुब से पूछ बैठा मेरे ग़म की वजह… फिर हल्का सा मुस्कुराया और कहा…. तुमने मोहब्बत की है कभी।
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कभी आह लब पे मचल गई कभी अश्क़ आँख से ढल गए, ये ग़म के चिराग है,कभी बुझ गए कभी जल गए…
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न खुशियों से मोहब्बत की न ग़म से दुश्मनी रखी… मेरे दिल ने मेरे हालात से बस दोस्ती रखी…
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दिल को ग़म ए हयात गवारा है इन दिनों, दिल को जो दर्द था,वही प्यारा है
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शाख से कट कर अलग होने का हम को ग़म नहीं
फूल  हैं ख़ुश्बू लुटा कर ख़ाक हो जाएंगे हम
*** (Sad Shayari)
आपकी याद आती रही रात-भर” चाँदनी दिल दुखाती रही रात-भर, . गाह जलती हुई, गाह बुझती हुई शम-ए-ग़म झिलमिलाती रही रात भर
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जिससे दुर हो जाए मेरे ग़म ! मौन रह कर भी तेरे दिल की गहराई तक फैली उस तन्हाई से बात कर सकूं !
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हम पर ग़म – ऐ – जहाँ हैं, ये और बात है…
हम फिर भी बेज़ुबान हैं, ये और बात है …!!
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बीते दिन अब कभी लौट कर ना आयेंगे,
हम कौन से ज़िन्दा हैं कि इस ग़म में मर जायेंगे।
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वो जब याद आये, बहोत याद आये
ग़म-ए-जिन्दगी के, अँधेरे में हम है चिराग-ए-मोहब्बत जलाए बुझाए …
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ग़म की गर्मी से दिल पिघलते रहे तजर्बे आँसुओं में ढलते रहे
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क्या जानू सजन होती है क्या ग़म की शाम जल उठे सौ दिए,जब लिया तेरा नाम.
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आँसुओ थोड़ी मदद मुझ को तुम्हारी चाहिए ग़म चले जाएँगे वर्ना दिल को बंजर छोड़ कर
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निकला हूँ मैं तलाश में शायद वफ़ा मिले, इस दर्द-ओ-ग़म के वास्ते कोई दवा मिले!
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ग़म-ए-दौरां में टूट-टूटकर बिखरी है हस्ती मेरी कर कुछ और सितम मेरा वजूद अभी बाकी है
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है अब इस मामूरे में, क़हत-ए-ग़म-ए-उल्फ़त असद, हमने ये माना के, दिल्ली में रहे खावेंगे क्या? Mirza Ghalib
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आसूओं में चाँद डूबा रात मुरझाई जिन्दगी में दूर तक, फ़ैली है तनहाई जो गुजरे हम पे वो कम है, तुम्हारे ग़म का मौसम है …!!
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उन लोगों का क्या हुआ होगा; जिनको मेरी तरह ग़म ने मारा होगा; किनारे पर खड़े लोग क्या जाने; डूबने वाले ने किस-किस को पुकारा होगा।
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अगर खो गया एक नशेमन तो क्या ग़म? मकामात-ए-आह-ओ-फुगाँ और भी हैं
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ग़म में डूबे ही रहे दम न हमारा निकला बहर-ए-हस्ती का बहुत दूर किनारा निकला
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तुम्हारे वास्ते ये ग़म उठाने वाला हूँ
रुको ए आंसुओ मैं मुस्कुराने वाला हूँ .
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हंस हंस के मेरी हालते ग़म देखनेवाले
ये दौलते ग़म तेरी बदौलत ही मिली है….!
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हँसने पर आँसू आते हैं रोना है फरेबी आँखों का,
उस दिन से ग़म है मेरे दिल में जिस दिन से उल्फ़त है सीने में,,,
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झूठ कहते हैं लोग कि मोहब्बत सब कुछ छीन लेती है
. . मैंने तो मोहब्बत करके, ग़म का खजाना पा लिया…!!!
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एक शख़्स ही बहुत है ग़म बाँटने के लिये
महफ़िलों में तो बस तमाशे बनते हैं
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ज़िन्दगी में सारा झगड़ा ही ख़्वाहिशों का है…..
ना तो किसी को ग़म चाहिए और ना ही किसी को कम चाहिए………
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मैं ज़िन्दगी का साथ निभाता चला गया, ग़म और ख़ुशी में फर्क ना महसूस हो जहा, मैं दिल को उस मक़ाम पे लाता चला गया।
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चले आते हैं ग़म बार-बार..क्या तरीका है..
कोई कह दो जिंदगी से भी…”ये हो चुका है”..!!
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घर में था क्या जो तेरा ग़म उसे ग़ारत करता?
वो जो हम रखते थे इक हसरत-ए तामीर,सो है! Mirza Ghalib
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तू देख या मत देख , इस बात का ग़म नहीं !
पर ये मत कह की हम तेरे कुछ नहीं !!
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ये जो अपनी जां के हरीफ़ हम, तेरी बेरुखी का शिकार थे
जो गिला करें भी तो क्या करें, तेरे अपने ग़म ही हज़ार थे..!
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मुसलसल ग़म उठाने से ये बेहतर है,
अगर मानो किनारा करने वालों से किनारा कर लिया जाए….!
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कर रहा था ग़म-ए-जहाँ का हिसाब आज तुम याद बेहिसाब आए …. !!
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शाम-ए-ग़म है तेरी यादों को सजा रक्खा है
मैं ने दानिस्ता चराग़ों को बुझा रक्खा है
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वो जो तुमने एक दवा बतलाई थी ग़म के लिए,
ग़म तो ज्यूं का त्यूं रहा बस हम शराबी हो गये
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मयखाने में आऊंगा मगर पियूँगा नहीं साकी ।।
ये शराब मेरा ग़म मिटाने की ताकत नहीं रखती।
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दर्द में लज़्ज़त बहुत अश्कों में रानाई बहुत
ऐ ग़म-ए-हस्ती हमें दुनिया पसंद आई बहुत,
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गुजर जाएगा ये दौर भी ज़रा इत्मीनान तो रख जब ख़ुशी ही ना ठहरी
तो ग़म की क्या औकात है।
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पी लेता हूँ यु हैं कभी-कभी ग़म भुलाने को
के डगमगाना ज़रूरी है संभलने के लिए
***
महब्बत में करें क्या हाल दिल का ख़ुशी ही काम आती है न ग़म
भरी महफ़ि‍ल में हर इक से बचा कर तेरी आँखों ने मुझसे बात कर ली
***
वही मैं हूँ वही है तेरे ग़म की कार-फ़रमाई* //
कभी तन्हाई में महफ़िल कभी महफ़िल में तन्हाई
***
जो ग़म-ए-हबीब से दूर थे वो ख़ुद अपनी आग में जल गए
जो ग़म-ए-हबीब को पा गए वो ग़मों से हँस के निकल गए।
***
तुमसे क्या कहें .. कितने ग़म सहे हमने बेवफ़ा ..
तेरे प्यार में ……! दिन गुज़र गया ऐतबार में रात कट गयी इंतज़ार में ……..
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