Wednesday, June 01, 2016

Khiza Shayari mix collection खिजां और पतझड़ पर शायरी संग्रह

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फिर देख उसका रंग निखरता है किस तरह,
दोशीजए- खिजां को खिताब-ए-बहार दे !! -अदम
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मंज़िल तो सबकी एक ही है, रास्ते हैं जुदा,
कोई पतझड़ से गुजरा, कोई सहरा से गया।
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उल्फ़त के मारों से ना पूछों आलम इंतज़ार का
पतझड़ सी है ज़िन्दगी, ख्याल है बहार का।
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खिजां के लूट से बर्बादिए-चमन तो हुई
यकीन आमदे-फस्ले-बहार कम न हुआ – मजाज
**** Khiza Shayari in Hindi

ये खिजां की ज़र्द सी शाल में जी उदास पेड़ के पास है
ये तुम्हारे घर की बहार है इसे आंसुओ से हरा करो
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पलकों से आँसुओं की क़तारों को पोंछ लो
पतझड़ की बात ठीक नहीं है बहार में.!!
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फूल खिलते हैं, लोग मिलते हैं मगर,
पतझड़ में जो फूल मुरझा जाते हैं,
वो बहारों के आने से खिलते नहीं.
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पतझड़ के मौसम में दिल को सुकून बहुत मिलता है…
शाख से टूटे हर पत्ते में चेहरा अपना जो दिखता है.
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अरसे बाद खिजां पलटी नज़र आई बहार
बरसों बीते तन्हाईओं के बाद आई खुमार
*** Khiza Shayari in Hindi
“सुनायेगी ये दास्तां शमा मेरे मजार की
खिजां में भी खिली रही ये कली अनार की
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खिजां अब आयेगी तो आयेगी ढलकर बहारों में,
कुछ इस अन्दाज से नज्मे-गुलिस्तां कर रहा हूँ मैं।
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फिर इसके बाद नज़रे नज़र को तरसेंगे
वो जा रहा है खिजां के गुलाब दे जाओ
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फूल चुन लिए उसने सारे मेरे शाख़े-गुल से
खिजां थी हिस्से मेरे, जो बागबां में ही रह गई
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न खिजां में है कोई तीरगी, न बहार में कोई रोशनी,
ये नजर-नजर के चराग है, कहीं जल गये, कहीं बुझ गये।
*** Khiza Shayari in Hindi
अब रंजिशो-खुशी से बहारो-खिजां से क्या
महवे-खयाले-यार हैं हमको जहाँ से क्या ~मजरूह सुल्तानपुरी
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सुकूत-ऐ-शाम-ऐ-खिजां में हुस्न की एक अंगड़ाई \
इधर सूखे दरख्तो पर हरे पत्ते निकल आए..
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होता नहीं है कोई बुरे वक्त में शरीक,
पत्ते भी भागते हैं खिजां में शजर से दूर। #असीर
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जुबां पे दर्द भरी दास्तान चली आई
बहार आने से पहले खिजां चली आई
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उम्मीदों के फूल गुलशन में कबके मुरझा चुके
जो बचा है खिजां में वो कांटों का तमाशा है
खिजां के लूट से बर्बादिए-चमन तो हुई
यकीन आमदे-फस्ले-बहार कम न हुआ – मजाज
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क्या खबर थी खिजां होगी मुक्कदर अपना,
मैंने तो माहौल बनाया था बहारों के लिए!
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तेरी जुल्फ में लगा सकूं, वो कली न मैं खिला सकूं
बेबस खिजां में बैठा हूं, वो बहार भी न मैं ला सकूं
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असीरान-ए-कफस को वास्ता क्या इन झमेलों से,
चमन में कब खिजां आई, चमन में कब बहार आई
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गुल खिलेंगे फिर कैसे दिल में आरजुओं के,
दोस्ती खिजां से जब करता गुलसितां अपना।
** Khiza Shayari in Hindi
खिजां पुरानी पड़ी, कूच कर गया सैयाद,
नई बहारें नए बागवां की बात करो।
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जहाँ बस्ती थी खुशियाँ, आज हैं मातम वहाँ
वक़्त लाया था बहारें वक़्त लाया है खिजां ।
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मुमकिन है कि तू जिसको समझता है बहारां ,
औरों की निगाहों में वो मौसम हो खिजां का …
*** Khiza Shayari in Hindi
तड़प रहे हैं हम यहाँ, तुम्हारे इंतज़ार में
खिजां का रंग, आ-चला है, मौसम-ए-बहार में
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जिसकी कफस में आंख खुली हो मेरी तरह,
उसके लिए चमन की खिजां क्या बहार क्या?
*** Khiza Shayari in Hindi
मिला जो पयार तो हम पयार के क़ाबिल न रहे
खिजां के फूल बहार के क़ाबिल न रहे।
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यही तंग हाल जो सबका है यह करिश्मा कुदरते रब का है
जो बहार थी सो खिजां हुई जो खिजां थी अब वह बहार है।”-जोश मलीहाबादी
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क्या हुआ जो खिजां के फूल सा मुरझा गए,
बनके “खुशबू ए जिंदगी” महकते रहेंगे हम ।
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खिले गुलशन-ए-वफा में गुल-ए-नामुराद ऐसे
ना बहार ही ने पूछा ना खिजां के काम आए
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गमों की फसल हमेशा तर-ओ-ताजा रही ,
ये वो खिजां है जो शर्मिन्दा-ए-बहार नहीं ……..
*** Khiza Shayari in Hindi
कांटो ने बहुत याद किया उन को खिजां में ,
जो गुल कभी जिंदा थे बहारों के सहारे ……
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फूलों की बस्ती में आखिर कांटों का क्या काम था
ऐ खुदा तेरे गुलशन में आ जाती क्यूं खिजां है…
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खिजां में पेड़ से टूटे हुए पत्ते बताते हैं…
बिछड़ कर अपनों से मिलती है बस दर-दर की दुत्कारी…
*** Khiza Shayari in Hindi
वह संभलेंगे गेसू जो बलखा गए हैं,
बहार आ रही है, खिजां के सहारे।
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खिजां के बाद गुलशन में बहार आई तो है लेकिन,
उड़ा जाता है क्यों अहल-ए-चमन का रंग क्या कहिए।
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