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मुझपे कयामत ढ़ाती है तेरी गजल सी सूरत

तू मेरे इश्क का बुरा अंजाम न कर
दिल रो दे मेरा ऐसा कोई काम न कर

बल खाने दे अपनी जुल्फों को हवाओं में
जूड़े बांधकर तू मौसम को परेशां न कर

मुझपे कयामत ढ़ाती है तेरी गजल सी सूरत
मेरे दिल की मैयत का अब इंतजाम न कर

ख्वाब ये टूट न जाए इस जनम में मेरा
इस बस्ती में मेरा इश्क सरेआम न कर
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