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ख़्वाजा मीर 'दर्द' (1720-1785) خواجہ میر دؔرد Khwaja Meer 'Dard'

जग में आ कर इधर-उधर देखा
तू ही आया नज़र जिधर देखा
जान से हो गए बदन ख़ाली
जिस तरफ़ तूने आँख भर देखा
नाला,फ़रियाद,आह और ज़ारी
आप से हो सका सो कर देखा

उन लबों ने न की मसीहाई
हम ने सौ-सौ तरह से मर देखा
ज़ूद आशिक़ मिज़ाज है कोई
दर्द को क़िस्सा मुख़्तसर देखा
नाला,फ़रियाद-रोना,विनती। ज़ारी - रोना पीटना । लब- होंठ। मसीहाई -उपचार। ज़ूद आशिक़ -तुरंत किसी को चाह लेने वाला। मुख़्तसर - संक्षिप्त ।
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