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Mix Shayri collection 16 / मिक्स शायरी संग्रह 16

दिल में इंतजार की लकीर छोड जायेगे॥
आँखों में यादो की नमी छोड जायेगे,
ढूंढ़ते फिरोगे हमें एक दिन ……..
जिन्दगी में एक दोस्त की कमी छोड जायेगे.

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‘सहारा लेना ही पड़ता है मुझको दरिया का
मैं एक कतरा हूँ तनहा तो बह नहीं सकता ”

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दो शब्द तसल्ली के भी नहीं मिलते इस शहर मैं
लोग दिल मैं भी दिमाग लिए फिरते हैं !!

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सफ़ाई देने में, और स्पष्ट करने में अपना समय बर्बाद न करें. लोग वही सुनते है, जो वे सुनना चाहते हैं….

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हम तो बस निशाने पर दिल रखना जानतें हैं
तेरे तरकश में कैसे कैसे तीर तुम जानो। ………!

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भूल जाना ‘मुझे’ इतना आसान नहीं है…
बातों बातो में ही बातों से निकल आऊंगा॥

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प्यार के दो मीठे बोल से खरीद लो मुझे ,
दौलत दिखाई तो सारे जहां की कम पड़ेगी…

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“क्यूँ ना गुरुर करता मैं अपने आप पे,

मुझे उसने चाहा… जिसके चाहने वाले हज़ारों थे…..

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“आँखों से दूर दिल के करीब था,
में उस का वो मेरा नसीब था.
न कभी मिला न जुदा हुआ,
रिश्ता हम दोनों का कितना अजीब था.”

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तुम ना अपनी ‘हद्द’ में रहा करो,
आजकल बे’हद्द’ याद आने लगे हो …!

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छोडो यह बहस और तकरार की बातें।
यह बताओं रात ख्वाबों में क्यों आये थे।।

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चाँद का मिजाज भी, तेरे जैसा है..
जब देखने की तम्मना होती है, नज़र नहीं आता…

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लहरों से खेलना तो समंदर का शौख है।
लगती है चोट कैसे, ये किनारो से पूछिए।

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बेमतलब की जिंदगी का अब सिलसिला ख़त्म …
अब जिस तरह की दुनियां , उस तरह के हम…

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मेरी न सही तो तेरी होनी चाहिए ,
तमन्ना एक की पूरी होनी चाहिए

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जैसा भी हूं अच्छा या बुरा अपने लिये हूं,
मै खुद को नही देखता औरो की नजर से….!!!!

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चलो दिल की अदला बदली कर लें,
तडप क्या होती है समझ जाओगे….

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तेरी सिर्फ एक निगाह ने खरीद लिया हमे,
बड़ा गुमान था हमे की हम बिकते नहीं।।

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मुझे ही नहीं रहा शौक ए मोहब्बत वरना ,

तेरे शहर की खिड़कियां इशारे अब भी करती हैं ।

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खुल जाता है उस की यादों का बाज़ार सुबह सुबह,

बस मेरा दिन इसी रौनक में गुज़र जाता है ।

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हाथ देखने वाले ने तो परेशानी में डाल
दिया मुझे,

बोला के मौत नही किसी की याद मार डालेगी तुझे…

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अब ऩ कोई हमे मोहब्बत का यकीन दिलाये,
हमें रूह में भी बसा कर निकाला है लोगो ने…

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“न जाने कब खर्च हो गये , पता ही न चला,
वो लम्हे , जो छुपा कर रखे थे जीने के लिए”…

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मैं अगर चाहु भी तो शायद ना लिख सकूं उन लफ़्ज़ों को
जिन्हे पढ़ कर तुम समझ सको की मुझे तुम से कितनी मोहब्बत है!!!!!

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जिसको तलब हो हमारी, वो लगाये बोली,
सौदा बुरा नहीं !.. …बस “हालात” बुरे है !..

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फिर इश्क़ का जुनूं चढ़ रहा है सिर पे ,
मयख़ाने से कह दो दरवाज़ा खुला रखे !

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बहुत ही नाजो से चूमा उसने लबो को मेरे मरते वक्त।

कहने लगीमंजिल आखिरी है रास्ते मेँ कहीँ प्यास न लग जाए॥

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वक़्त बड़ा अजीब होता हे इसके साथ चलो तो किस्मत बदल देता हे …

ना चलो तो किस्मत को ही बदल देता हे…

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कल तेरा ज़िक्र आ गया घर में,,
ओर…घर देर तक महकता रहा.!!!!!

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जिस दिन भी तेरी याद टूट कर आती है “ऐ जान”

मेरी आँखों के साथ ये बारिश भी बरस जाती है…

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सागर के किनारो पे खजाने नहीं आते।
पल जो फीसल गये हाथ से वो दुबारा नहीं आते।

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अपनों की चाहतों में मिलावट थी इस कदर की……………..

मै तंग आकर दुश्मनों को मनाने चला गया…

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यूँ ही मौसम की अदा देखकर याद आया है,

किस क़दर जल्द बदल जाते हैं इंसान, जाना|

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ज़िन्दगी शायद कहीं फिर से रास्ते मिला दे,

मगर एक बात याद रखना कि “तुम मुझे खो चुके हो”|

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चुपके से नाम तेरे गुजार देंगे जिंदगी
लोगों को फिर बताएंगे, प्यार ऐसे भी होता है॥

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हम तस्लीम करते हैं, हमें फुर्सत नहीं मिलती,

मगर ये भी ज़रा सोचो, तुम्हें जब याद करते हैं, ज़माना भूल जाते हैं|

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किसे सुनाँए अपने गम के चन्द पन्नो के किस्से,

यहाँ तो हर शक्स भरी किताब लिए बैठा हे…

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तूने तो रुला के रख दिया ए-जिन्दगी,,
जा कर पूछ मेरी माँ से, कितना लाड़ला था मैं….

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अजीब अँधेरा है ऐ इश्क तेरी महफिल मे ,
किसी ने दिल भी जलाया तो रौशनी न हुई…

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जिँदगी मेँ दोस्त नही,
बल्कि
दोस्त मेँ जिँदगी होनी चाहिए..

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उसी का शहर, वही मुद्दई, वही मुंसिफ
हमीं यकीन था, हमारा कुसूर निकलेगा

यकीन न आये तो एक बार पूछ कर देखो
जो हंस रहा है वोह ज़ख्मों से चूर निकलेगा

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तेरे पास में बैठना भी इबादत
तुझे दूर से देखना भी इबादत …….
न माला, न मंतर, न पूजा, न सजदा
तुझे हर घड़ी सोचना भी इबादत….

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“खुद को खो दिया हमने , अपनों को पाते पाते !

और लोग पूछते है , कोई तकलीफ तो नहीं” …..!!!

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तकदीर के हाथों खुद को में जोड़ना नहीं चाहता,
मेरे दो हाथो का होसला में तोडना नहीं चाहता,
मौसम की तरह बदल जाती ये हाथो की लकीरें,
बंद मुट्ठी मेरी हरगिज़ मैं खोलना नहीं चाहता।

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हर एक चेहरे को ज़ख़्मों का आईना न कहो !
ये ज़िन्दगी तो है रहमत इसे सज़ा न कहो….!!

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“इन हसीनो से तो कफ़न अच्छा है,
जो मरते दम तक साथ जाता है,
ये तो जिंदा लोगो से मुह मोड़ लेती हैं,
कफ़न तो मुर्दों से भी लिपट जाता है.”

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शायर तो हम
“दिल” से है….

कमबख्त “दिमाग” ने
व्यापारी बना दिया..

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