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Mix Shayri collection 4 / मिक्स शायरी संग्रह 4

“हर सागर के दो किनारे होते है,
कुछ लोग जान से भी प्यारे होते है,
ये ज़रूरी नहीं हर कोई पास हो,
क्योंकी जिंदगी में यादों के भी सहारे होते है.”
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और कुछ भी दरकार नहीँ मुझे तुझसे मौला ,
मेरी चादर मेरे पैरों के बराबर कर दे..!!
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वो न आए उनकी याद वफ़ा कर गई,
उनसे मिलने की चाह सुकून तबाह कर गई,
आहट दरवाज़े की हुई तो उठकर देखा,
मज़ाक हमसे हवा कर गई.
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जमाने से कब के गुजर गए होते,
ठोकर न लगी होती तो बच गए होते,
बंधे थे बस तेरी दोस्ती के धागे में,
वरना कब के बिखर गए होते |
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जिंदगी का खेल शतरंज से भी मज़ेदार होता है,
लोग हारते भी है तो अपनी ही रानी से 
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ना शाखों ने जगह दी ,, ना हवाओं ने बख्शा..!!
मैं हूँ टुटा हुआ पत्ता ,, आवारा ना बनता तो क्या करता ..?
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आइना देखा जब ,तो खुद को तसल्ली हुई,
ख़ुदग़र्ज़ी के ज़माने में भी कोई तो जानता है हमें ..!!
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काश बनाने वाले ने दिल कांच के बनाये होते,
तोड़ने वाले के हाथ में ज़ख्म तो आये होते.
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दादागिरी तो हम मरने के बाद भी करेंगे ,
लोग पैदल चैलेगे और हम कंधो पर…
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वो मन्दिर भी जाता है और मस्जिद भी;
परेशान पति का कोई मज़हब नहीं होता!!
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चेहरे अजनबी हो भी जायें तो कोई बात नहीं लेकिन,
रवैये अजनबी हो जाये तो बड़ी तकलीफ देते हैं…।”
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जहाँ यार याद न आए वो तन्हाई किस काम की, बिगड़े रिश्ते न बने तो खुदाई किस काम की,
बेशक अपनी मंज़िल तक जाना है ,
पर जहाँ से अपना दोस्त ना दिखे वो ऊंचाई किस काम की ..
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पलकों पे शबनम लिखते हैं,
जब आँखों का ग़म लिखते हैं,
गीत ग़ज़ल सब झूठी बातें,
ज़ख़्मों पे मरहम लिखते हैं,
रूठा है इक साथी जबसे,
चाहत के मौसम लिखते हैं,
उनका है कुछ ज़्यादा हिस्सा,
खुद को थोड़ा कम लिखते हैं,
जब तन्हा रोती हैं रातें,
यादों को हमदम लिखते हैं,
क्यूँ खटके दुनिया को,
ऐसा भी क्या हम लिखते हैं,
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एक छुपी हुई पहचान रखता हूँ,
बाहर शांत हूँ, अंदर तूफान रखता हूँ,
रख के तराजू में अपने दोस्त की खुशियाँ,
दूसरे पलड़े में मैं अपनी जान रखता हूँ।
बंदों से क्या, रब से भी कुछ नहीं माँगा
मैं मुफलिसी में भी नवाबी शान रखता हूँ।
मुर्दों की बस्ती में ज़मीर को ज़िंदा रख कर,
ए जिंदगी मैं तेरे उसूलों का मान रखता हूँ।
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ज़मीन पर तो वो मेरा नाम लिखते है और मिटाते है…
उनका तो टाइम पास हो जाता है…
कमबख्त मिट्टी में हम मिल जाते है…
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ज़हर मिलता रहा ज़हर पीते रहे
रोज़ मरते रहे रोज़ जीते रहे
ज़िंदगी भी हमें आजमाती रही
और हम भी उसे आजमाते रहे
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बस इतनी सी बात पर हमारा परिचय तमाम होता है !
हम उस रास्ते नही जाते जो रास्ता आम होता है…!!!!
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ये कफ़न,
ये जनाजे,
ये कबर…
रस्म-ऐ-दुनिया है दोस्त,
मर तो इंसान तब ही जाता है
जब याद करने वाला कोई न हो…
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मेरी आँखों के जादू से अभी तुम नावाकिफ़ हो
हम उसे ज़ीना सिखा देते हे जिसे मरने का शौक़ हो
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उतरे जो ज़िन्दगी तेरी गहराइयों में।
महफ़िल में रह के भी रहे तनहाइयों में
इसे दीवानगी नहीं तो और क्या कहें।
प्यार ढुढतेँ रहे परछाईयों मेँ।
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हमारे इश्क का अंदाज कुछ अजीब सा था, दोस्तों, लोग इन्सान देखकर मोहब्बत करते है,
हमनें मोहब्बत करके इन्सान देख लिया !!!
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मुद्दतों बाद जब उनसे बात हुई तो बातों बातों में मैंने कहा..
“कुछ झूठ ही बोल दो”
और वो हँस के बोले….
तुम्हारी याद बहुत आती है!!!
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