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संगम किनारे जन्मी एक प्रेम कथा.....

अब मुझे खुद पर ही गुस्साआ रहा था, आखिर मैने क्या सोच कर उससे मिलने के लिये हाँ कर दी थी, पाँच साल बाद अचानक उसका फोन आया था, और उसकी एक काल पर मैं मिलने को तैयार हो गयी थी, कहाँ गया था मेरा वो मान, कैसे भूल गयी गयी थी मैं उन सभी बातों को, 


सोचते सोचते मैं वक्त की नदी के उस छोर पर पँहुच गयी जहाँ अभिजीत से पहली बार मिली थी। उस दिन मेरा मूड कुछ खराब था, और जब भी ऐसा होता था मैं संगम की सीढियों में आकर बैठ जाती थी, उसकी लहरों को देखते देखते कब मेरे मन का दुख दर्द उसकी लहरें अपने में समेट कर ले जाती थी, मुझे पता ही नही चलता था। उस दिन भी मैं लहरों में खोई हुयी थी कि अचानक से वो आया , और बोला- मैम अगर आपको तकलीफ ना हो तो क्या आप अपनी कार से मेरे चाचा जी को अस्पताल पहुँचा सकती हैं, मैने नजर उठाकर देखा तो पास ही कुछ ऊपर की सीढी पर एक आदमी लेटा हुआ था , शायद उसको माइल्ड हार्ट अटैक हुआ था। बिना कुछ सोचे वक्त गवायें मैं बाहर की तरफ आ गयी, वो कुछ और लोगों के साथ अपने चाचा जी को लेकर पीछे की सीट पर बैठ गया। सिविल लाइन्स के नाजरथ हास्पिटल में उसको ले गयी, क्यों कि पिता जी वहाँ सीनियर डाक्टर थे । उस दिन के बाद फिर तो पता नही कैसे मुलाकातें होने लगी, और एक दिन अहसास हुआ कि अभिजीत मेरी जिन्दगी का हिस्सा ही नही, मेरी जिन्दगी है। पर इससे पहले की मैं या वो मुझसे अपनी बात कहता, संगम की लहरों की तरह ना जाने कँहा खो गया । और मैं बस खुद को ठगा सा महसूस करने के सिवा कुछ ना कर सकी । 

आज भी मैं उसी संगम के तट पर उससे मिलने जा रही थी, एक एक पल मुझे एक दिन से कम ना लग रहा था, लग रहा था कि काश उड सकती तो उड के पहुँच जाती, कीडगंज से संगम का रास्ता इससे पहले कभी लम्बा ना लगा था, एक मन कहता क्यों उसके बताये ठीक वक्त पर या उससे पहले पहुँचना चाहती हूँ , वो क्या कभी तुम्हारे बताये या कहे समय पर आया भी है, आज भी जाकर तुमको ही इन्तजार करना पडेगा जो पाँच साल पहले किया करती थी, मगर फिर भी गाडी की रफ्तार मैं कितनी तेज कर चुकी थी , ये तब पता चला जब बगल से निकलती कार से टकराते टकराते बची।

सरस्वती घाट पर किनारे कार लगाई और लगभग भागते हुये सीढियों की तरफ कदम बढाये, एक सरसरी निगाह से लगभग यही सोचते हुये देखा कि वो अभी नही आया होगा, मगर निगाहें उसे देखेते ही बस ठ्हर सी गयी, कदमों में ऐसा लगा जैसे किसी ने बेडियां डाल दी हो , दिल शताब्दी से भी ज्यादा रफ्तार से चल रहा था, मन में इतनी हलचल थी, कि शायद ही सागर के हदय में तब भी इतनी हलचल नही उठी होंगीं, जब सागर मन्थन हुआ होगा । अब तक वो मेरे सामने आ चुका था । मेरी तन्द्रा तब टूटी जब उसने कहा- कैसी हो लेखा? 

रास्ते भर कितना सोच कर आयी थी कि  चाहे कुछ भी हो जाय उसके सामने मैं अपनी किसी भावना को , किसी कमजोरी को प्रकट नही करूंगीं । दिखा दूंगीं उसको कि मैं उसके बिना भी खुश हूँ और पहले से कही ज्यादा । मगर दिल भी कब खुद को ही दगा दे जाय ये कोई नही जान सकता, उसके प्यार भरे एक वाक्य ने मुझे बिखेर कर रख दिया, आंखें छलक आयी, खुद को संभालते हुये बोली- अच्छी हूँ और तुम , आज यहाँ इतने लम्बे अरसे बाद ............ कुछ और कहना चाह रही थी मगर सारे शब्द गले में ही रुक कर रह गये। 

लेखा तुम्हारे सारे सवालों का जवाब देने ही तो आया हूँ, मुझे यकीन था तुम जरूर आओगी। और कहते ही उसने दो कागज मेरे सामने कर दिये । पहला कागज मैने खोला, ये तो मेरे पापा की लिखावट थी, ये क्या मेरे पापा ने उससे वचन लिया था- जब तक मैं डाक्टर ना बन जाता लेखा से किसी भी तरह का सम्पर्क नही करूँगा। और अगर मैने ऐसा किया या ये कहा कि मैं डाक्टर नही बन सकता तो आप अपनी बेटी के  भविष्य का कोई भी निर्णय लेने से पहले मेरा विचार नही करेंगें  और नीचे अभिजीत के दस्तखत थे। तभी मैने दूसरा कागज देखा ये थी उसकी डाक्टर की डिग्री। 

इससे पहले की मैं सोचती कि पापा ने मुझे कुछ क्यों नही बताया अभिजीत ने कहा- लेखा तुम्हारे पापा ने जो किया वो हमारी और तुम्हारी भलाई के लिये ही तो था। आज उनके कारन ही मैं एक इन्सान बन सका, वरना तुम ही सोचो क्या था मैं पाँच साल पहले। आज मैं इस लायक हूँ कि उनसे तुम्हे मांग सकूं, क्या तुम इस बीमार डाक्टर के दिल का इलाज करोगी डाक्टर लेखा......

मैने संगम की लहरों की और देखा, जो मेरे इस संगम की साक्षी बन रही थी, और उसकी कलकल की ध्वनि अपनी सहमति प्रकट कर रहीं थी ।
 
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