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अख्तर शीरानी का संछिप्त परिचय और कुछ उनके चुनिन्दा शायरी, और गजल

‘अख़्तर’ शीरानीके पूर्वज टौंक रियासतके निवासी थे। वहीं पर आपका 4 मई 1905 ई. में जन्म हुआ। आपका जन्मका नाम दाऊददख़ाँ था और अफ़ग़ानोंके ‘शीरानी’ कबीले से संबंधित थे। होश सँभालनेपर आपने ‘अख़्तर’ तखल्लुम और शीरानी वंश हानि के कारण अपने को अख़्तर शीरानी लिखना पसन्द किया और इस नामसे आपने ख्याति पाई। आपके पिता हाफ़िज़ मदमूदखाँ शीरानी फ़ारसी साहित्य और इतिहासके बहुत बड़े विद्वान थे और फ़ारसी पिंगल-शास्त्रके भारत में सर्वोच्च अधिकारी थे। हाफ़िज़जी 1914 ई. में अपनी शिक्षा पूर्ण करके विलायतसे भारत वापिस आये तो आपने अख़्तर के लिए फ़ारसी-विद्वान्, एक व्यायाम-मास्टर और एक खुशख़तनवीस को नियुक्त किया।

सन् 1920 में रियासत टौंकसे हाफ़िज़जी किसी कारण से निर्वासित किये गये तो आप सपरिवार लाहौर चले गये, अख़्तर भी साथ थे। वहाँ हाफ़िज़जी प्रारम्भ में ओरियण्टल कालेजके और बादमें पंजाब यूनिवर्सिटीके प्रोफ़ेसर रहे। अख़्तरने 1922 ई. में मुंशी फ़ाज़िलकी परीक्षा पास की। आपके पिताकी उत्कट अभिलाषा थी कि ‘अख़्तर’ उच्च-से-उच्च शिक्षा प्राप्त करें, किन्तु अख़्तरकी शाइरीके शौकने यह क्रम चलने नहीं दिया।

शाइरी का शौक़

अख़्तरने अपने अध्यावसायसे अरबी और अंग्रेज़ीका भी थोड़ा-बहुत अभ्यास कर लिया था, किन्तु व्यवस्थित रूपसे कालेजमें शिक्षा प्राप्त न कर सके। यूँ तो आपका बचपनसे ही शाइरीकी तरफ़ रुझान था, किन्तु लाहौर के वातावरण ने उसे और भी हवा दी। 1924 ई. में जब कि आप 19 वर्ष के भी न हो पाये थे। आपकी पहली नज़्म ‘जोगन’ उर्दू-पत्रिकामें प्रकाशित हुई तो
उर्दू-अदीबोंका ध्यान बरबस आपकी तरफ़ आकर्षित हो गया, और अपने-अपने पत्र-पत्रिकाओं के लिए नज़्में भेज देने के लिए सम्पादकोंके तक़ाजोंका ताँता लग गया। जिस पहली नज़्म से आपको ख्याति मिली उसके 50 में- 14 शेर बतौर नमूना यहाँ दिये जा रहे हैं-
 
देखो ! वह कोई जोगन जंगलमें गा रही है
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देखों ! वह कोई जोगन जंगलमें गा रही है,
मौसीक़-ए-हज़ींके1 दरिया बहा रही है
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हर लरज़िशे-सबामें2 तूफ़ाँ उमड़ रहे हैं,
किस दु:ख भरी अदा से तानें लगा रही है,
अठखेलियोंका सिन है, हँस बोलने का दिन है,
लेकिन न जाने क्यों वह आसूँ बहा रही है,
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है एक सितार उसके आग़ोशे-नाज़नींमें3
दो नाजुक उँगलियों से जिसको बजा रही है,
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जंगलके जानवर कुछ बैठे हैं उसके आगे
रो-रोके जिनको अपनी बिपता सुना रही है
खूँख़्वार शेर भी हैं वहशी ग़ज़ाल4 भी हैं,
लेकिन वह सबके दिल पर सिक्का जमा रही है,
कुछ साँप झूमते हैं रह-रहके मस्त होकर
इक मौजे-वज्द5 उनकी रग-रग पै छा रही है,
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गजल >>>
 
ऐ दिल वो आशिक़ी के फ़साने किधर गए
वो उम्र क्या हुई वो ज़माने किधर गए

वीराँ हैं सहन ओ बाग़ बहारों को क्या हुआ
वो बुलबुलें कहाँ वो तराने किधर गए

है नज्द में सुकूत हवाओं को क्या हुआ
लैलाएँ हैं ख़मोश दिवाने किधर गए

उजड़े पड़े हैं दश्त ग़ज़ालों पे क्या बनी
सूने हैं कोह-सार दिवाने किधर गए

वो हिज्र में विसाल की उम्मीद क्या हुई
वो रंज में ख़ुशी के बहाने किधर गए

दिन रात मय-कदे में गुज़रती थी ज़िन्दगी
'अख़्तर' वो बे-ख़ुदी के ज़माने किधर गए

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