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अख़्तर-उल-ईमान का संछिप्त परिचय और कुछ उनके रचना,

अख़्तर-उल-ईमान
जन्म: 12 नवंबर 1915 निधन: 1996
जन्म स्थान क़िला, नजीबाबाद, बिजनौर, उत्तर प्रदेश, भारत। प्रमुख कृतियाँ तारीक सय्यारा (1943), गर्दयाब (1946), आबजू (1959), यादें (1961), बिंत-ए-लम्हात (1969), नया आहंग (1977), सार-ओ-सामान !983)- सभी कविता-संग्रह विविध साहित्य अकादमी पुरस्कार (1962) ।
राष्ट्रीय इक़बाल सम्मान, 1988-89, (मध्यप्रदेश शासन) ।
दो बार फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड ।
मुख्यतः नज़्में लिखीं।
फिल्मी-लेखक और एक नामवर शायर ।


>>> कुछ उनके रचना
काम अब कोई न आएगा बस इक दिल के सिवा

काम अब कोई न आएगा बस इक दिल के सिवा
रास्ते बंद हैं सब कूचा-ए-क़ातिल के सिवा

बायस-ए-रश्क़ है तन्हा रवी-ए-रहरौ-ए-शौक़
हमसफ़र कोई नहीं दूरी-ए-मंज़िल के सिवा

हम ने दुनिया की हर इक शै से उठाया दिल को
लेकिन इक शोख के हंगामा-ए-महफ़िल के सिवा

तेग़ मुन्सिफ़ हो जहाँ दार-ओ-रसन हों शाहिद
बेगुनाह कौन है उस शहर मे क़ातिल के सिवा

ज़ाने किस रंग से आई है गुलशन में बहार
कोई नग़मा ही नही शोर-ए-सिलासिल के सिवा
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तहलील

मेरी मां अब मिट्टी के ढेर के नीचे सोती है
उसके जुमले, उसकी बातों,
जब वह जिंदा थी, कितना बरहम हो जाती थी थी
मेरी रोशन तबई, उसकी जहालत
हम दोनों के बीच एक दीवार थी जैसे

‘रात को ख़ुशबू का झोंका आए, जिक्र न करना
पीरों की सवारी जाती है’
‘दिन में बगूलों की जद में मत आना
साये का असर हो जाता है’
‘बारिश-पानी में घर से बाहर जाना तो चौकस रहना
बिजली गिर पड़ती है- तू पहलौटी का बेटा है’

जब तू मेरे पेट में था, मैंने एक सपना देखा था-
तेरी उम्र बड़ी लंबी है
लोग मोहब्बत करके भी तुझसे डरते रहेंगे

मेरी मां अब ढेरों मन मिट्टी के नीचे सोती है
सांप से मैं बेहद ख़ाइफ़ हूं
मां की बातों से घबराकर मैंने अपना सारा जहर उगल डाला है
लेकिन जब से सबको मालूम हुआ है मेरे अंदर कोई जहर नहीं है
अक्सर लोग मुझे अहमक कहते हैं।

तहलील - अन्तर्विश्लेषण 
रोशन तबई - उदारता
बरहम - ग़ुस्सा
ख़ाइफ़ - भयभीत
अहमक - मूर्ख
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