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मुंशी अमीर अहमद "मीनाई" का संछिप्त परिचय और कुछ उनके कुछ रचना

मुंशी अमीर अहमद "मीनाई" (जन्म १८२८-मृत्यु १९००) एक उर्दू शायर थे। 1857 के ग़दर के बाद ये रामपुर चले आए और ४३ वर्षों तक वहाँ रहे। १९०० में हैदराबाद जाने के बाद इनकी मृत्यु हो गई। इन्होंने २२ किताबें लिखीं जिसमें ४ दीवान (ग़ज़ल संग्रह) हैं।
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इश्क़ में जाँ से गुज़रते हैं गुज़रने वाले
मौत की राह नहीं देखते मरने वाले

आख़िरी वक़्त भी पूरा न किया वादा-ए-वस्ल
आप आते ही रहे मर गये मरने वाले

उठ्ठे और कूच-ए-महबूब में पहुँचे आशिक़
ये मुसाफ़िर नहीं रस्ते में ठहरने वाले

जान देने का कहा मैंने तो हँसकर बोले
तुम सलामत रहो हर रोज़ के मरने वाले

आस्माँ पे जो सितारे नज़र आये 'आमीर'
याद आये मुझे दाग़ अपने उभरने वाले

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1.
है दिल को शौक़ उस बुत-ए-क़ातिल की दीद का
होली का रंग जिस को लहू है शहीद का

दुनिया परस्त क्या रहे उक़बा करेंगे तै
निकलेगा ख़ाक घर से क़दम ज़न मुरीद का

होने न पाए ग़ैर बग़लगीर यार से
अल्लाह यूँ ही रोज़ गुज़र जाए ईद का

सारा हिसाब ख़त्म हुआ हश्र हो चुका
पूछा गया न हाल तुम्हारे शहीद का

जाके सफ़र में भूल गए हमको वो अमीर
याँ और दोस्तों ने लिखा ख़त रसीद का

2.
फ़िराक़-ए-यार ने बेचैन मुझको रात भर रक्खा
कभी तकया इधर रक्खा, कभी तकया उधर रक्खा

बराबर आईने के भी न समझे क़द्र वो दिल की
इसे ज़ेर-ए-क़दम रक्खा उसे पेश-ए-नज़र रक्खा

तुम्हारे संग-ए-दर का एक टुकड़ा भी जो हाथ आया
अज़ीज़ ऐसा किया कि मर कर उसे छाती पे धर रक्खा

जिनाँ में साथ अपने क्यों न ले जाऊँ मैं नासेह को
सुलूक ऐसा ही मेरे साथ है हज़रत ने कर रक्खा

बड़ा एहसाँ है मेरे सर पे उसकी लग़ज़िश-ए-पा का
कि उसने बेतहाशा हाथ मेरे दोश पर रक्खा

तेरे हर नक़्श-ए-पा को रेहगुज़र में सजदा कर बैठे
जहाँ तूने क़दम रक्खा वहाँ हमने भी सर रक्खा

अमीर अच्छा शगून-ए-मय किया साक़ी की फ़ुरक़त में
जो बरसा अब्र-ए-रेहमत जा-ए-मय शीशे में भर रक्खा

इश्क़ में जाँ से गुज़रते हैं गुज़रने वाले
मौत की राह नहीं देखते मरने वाले

आख़िरी वक़्त भी पूरा न किया वादा-ए-वस्ल
आप आते ही रहे मर गये मरने वाले

उठ्ठे और कूच-ए-महबूब में पहुँचे आशिक़
ये मुसाफ़िर नहीं रस्ते में ठहरने वाले

जान देने का कहा मैंने तो हँसकर बोले
तुम सलामत रहो हर रोज़ के मरने वाले

आस्माँ पे जो सितारे नज़र आये 'आमीर'
याद आये मुझे दाग़ अपने उभरने वाले - See more at: http://new-kavita-kosh.blogspot.in/2014/11/blog-post_919.html#sthash.7QzTo8g3.dpuf

इश्क़ में जाँ से गुज़रते हैं गुज़रने वाले
मौत की राह नहीं देखते मरने वाले

आख़िरी वक़्त भी पूरा न किया वादा-ए-वस्ल
आप आते ही रहे मर गये मरने वाले

उठ्ठे और कूच-ए-महबूब में पहुँचे आशिक़
ये मुसाफ़िर नहीं रस्ते में ठहरने वाले

जान देने का कहा मैंने तो हँसकर बोले
तुम सलामत रहो हर रोज़ के मरने वाले

आस्माँ पे जो सितारे नज़र आये 'आमीर'
याद आये मुझे दाग़ अपने उभरने वाले - See more at: http://new-kavita-kosh.blogspot.in/2014/11/blog-post_919.html#sthash.7QzTo8g3.dpuf
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