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इमाम अहमद रज़ा खान अलैहिर्रहमां देवबंदी पूर्वजों की नज़र में

इमाम अहमद रज़ा खान अलैहिर्रहमां  देवबंदी पूर्वजों की नज़र में
नह्मदुहू व नुसल्ली अला रसूलिहिल करीम अम्मा बअद
अस्सलामु अलैकुम व रह्मतुल्लाहिबर्कातहू

आदरणीय पाठकों ! आप ने देखा होगा आज कल कुछ देवबंदी विचार धारा के लोग आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा खान बरेलवी अलैहिर्रहमां पर प्रसार अभिशाप करते नजर आते हैं और आला हज़रत अलैहिर्रहमां को मुआज़ल्लाह काफ़िर व गुस्ताख़ कहते हैं हालाँकि यह विचार उनके बड़े पूर्वज गुरुओं का नहीं, जिन में मौलवी अशरफ अली थानवी, मौलवी तय्यब कासमी देवबंदी (प्रबंधक दारुल उलूम देवबंद) मौलवी अनवर शाह कश्मीरी, जिया उर्रहमान फारूकी (संरक्षक आला सिपाहे सहाबा), मौलवी इद्रीस हूश्यार पूरी, मौलवी इस्हाक़ देवबंदी, मौलवी युसूफ लुध्यान्वी (अल्लामा बनोरी टाउन कराची) मुफ़्ती अब्दुस्सत्तार देवबंदी (जामिया खैरुल मदारिस), मौलवी मुहम्मद शफ़ी आदि हैं | इन सब देवबंदी विचार धारा के लोगों नज़दीक आला हज़रत अलैहिर्रहमां और उनके मानने वाले सुन्नी हैं |
आदरणीय पाठकों ! आप आश्चर्य में होंगे कि इतने बड़े बड़े देवबंदी उलमा अगर आला हज़रात अश्शाह इमाम अहमद रज़ा अलैहिर्रहमां के बारे में अच्छी सिद्धांत रखते हैं तो फिर मौजूदा चरमपंथी देवबंदी उलमा आला हज़रत अज़ीमुल बरकत हज़रत इमाम अहमद रज़ा खान बरेलवी अलैहिर्रहमां को काफ़िर व गुस्ताख क्यूँ कहते हैं ?
तो इसका उत्तर यह है कि अंग्रेज़ के पैसों पर पलने वाले कुछ मौलवीयूँ ने अल्लाह और उसके महबूब सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की शान में गुस्ताखियाँ कीं जिन पर उलमा अहले सुन्नत व जमाअत ने उनका खूब विरोध किया जिन में  प्रमुख आला हज़रत अज़ीमुल बरकत अश्शाह इमाम अहमद रज़ा खान अलैहिर्रहमां की व्यक्तित्व है | अपने बड़े पूर्वज गुरुओं से अंधी आस्था रखने वाले इन देवबंदी विचार धारा के लोगों से अपने पूर्वजों की गुस्ताखीयूँ की सही व्याख्या तो ना हो सकी अलबत्ता इन्होंने “उल्टा चोर कोतवाल को डांटे” की मिस्ल हम अहले सुन्नत व जमाअत को उलटा गुस्ताख कहना शुरू कर दिया | इस कारनामा को सर अंजाम देने के लिए इन देवबंदी विचार धारा के लोगों ने उलमा अहले सुन्नत व जमाअत और विशेषकर आला हज़रत अज़ीमुल बरकत अश्शाह इमाम अहमद रज़ा खान अलैहिर्रहमां की पुस्तकों में दर्ज पाठ को कतरोबरीद (कांट छांट) के साथ गलत रंग देते हुवे गुस्ताखाना व कुफ्रिया क़रार दिया | इन कि इस हरकत से अल्हम्दुलिल्लाह आला हज़रत अज़ीमुल बरकत अश्शाह इमाम अहमद रज़ा खान अलैहिर्रहमां और अन्य विद्वाने अहले सुन्नत व जमाअत की शान में तो कुछ फर्क ना आया अलबत्ता लोगों पर इन हज़राते देवबंद के मजीद धोखाधारी एवं मक्कारी प्रकट हो गए | उलमा अहले सुन्नत व जमाअत ने आला हज़रत अज़ीमुल बरकत अश्शाह इमाम अहमद रज़ा खान अलैहिर्रहमां और अन्य उलमा पर होने वाले आपत्ति के सबूत के साथ उत्तर लेख लिखी जो किसी भी शोध पसंद मनुष्य के लिए इत्मीनान का कारण होगा लेकिन में दिफ़ाऐ (बचाव) आला हज़रत अज़ीमुल बरकत अश्शाह इमाम अहमद रज़ा खान अलैहिर्रहमां के लिए दोसरे तरीका लिखने का सोचा कि क्यूँ ना देवबंदी मज़हब के पूर्वज गुरुओं से आला हज़रत अलैहिर्रहमां के पुष्टि बयान की जाये और देवबंदी संगठन के पूर्वजों ही की कलम से इन देवबंदी शिष्य का रद्द किया जाये जो मुआज़ल्ला आला हज़रत अलैहिर्रहमां को काफ़िर व गुस्ताख कहते समय ज़रा भी खौफे खुदा महसूस नहीं करते |
मेरी उन तमाम देवबंदी विचार धारा के लोगों से गुज़ारिश है कि वह देवबंदियत की ऐनक  उताड़ कर अगर मेरे इस निबंध को पढ़ेंगे तो इं शा अल्लाह उनके लिए यह निबंध हिदायत का सामान होगा और उन्हें अपने गलत विचार से वापसी पर हिम्मतप्रदान करेगा और आला हज़रत अज़ीमुल बरकत अश्शाह इमाम अहमद रज़ा खान अलैहिर्रहमां की बे अद्बी व गुस्ताखी से बचने की तौफीक भी मिलेगी |
पैश है पुस्तक “खुत्बाते हकीमुल इस्लाम भाग ७ लेखक मौलवी इद्रीस होशियार पूरी (प्राचार्य मुदर्रिस मदरसा तह्फीज़ुल क़ुरान) इस पुस्तक में देवबंदी बीमारे  उम्मत के हकीम मौलवी तय्यब कासमी के खुतबात हैं इस पुस्तक को क़ुतुब खाना मजीदिया मुल्तान ने पर्काशित किया है और यह देवबंदीयूँ की प्रामाणिक पुस्तक है इस पर कई देवबंदी मौलवीयूँ की समर्थन मौजूद है |
जिन में प्रथम प्रस्तावना “मुफ़्ती अब्दुस्सातर देवबंदी मुख्य दारुल इफ़तह जामिया खैरुल मदारिस” की है | इन साहब ने अपनी प्रस्तावना में उस पुस्तक की और मौलवी तय्यब कासमी कीसराहना भी की है और इस पुस्तक को संकलित करने वाले मौलवी इद्रीस को खुब सराहा है इसी तरह दुसरे प्रस्तावना मौलवी युसूफ लुध्यान्वी की है उसने भी इस पुस्तक को सराहा है और अन्य देवबंदी मौलवीयूँ की समर्थन भी मौजूद है जिन में मौलवी फतह मुहम्मद, मौलवी इस्हाक़, और मौलवी शफ़ी देवबंदी का पुष्टि पत्र  (पेज ४३) भी है जिस में लिखा है कि:
“अलहम्दु लिल्लाह बंदा ने शुरू से आखिर तक तमाम मसूदा (पूरे लेख को) ब नज़रे अमीक़ (नज़रों की गहराईयूँ से) देखा और मुताअद् दद (कई) मुकामात पर बराए इस्लाह निशानदेही (पहचान) की”
इस पाठ से पता चला कि इन खुतबात को प्रस्तुत करने में बहुत सावधानी बरती गयी और इसकी पर्काशित के लिए बड़े बड़े देवबंदी मौलवीयूँ से राबता किया गया और खूब गहरी नज़र से पढ़ने के बाद जो कुछ नज़र आया इसकी इस्लाह कर दी जो कुछ सही था उसे पर्काशित कर दिया | अब यह तो था इस पुस्तक के परिचय के यह एक प्रामाणिक पुस्तक है इस में लिखा किया है ? वह आप अब गौर फ़रमायें |
इस पुस्तक में तीन स्थानों पर आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा खान अलैहिर्रहमां को रहमतुल्लाहि अलैह कहा गया है |
१. पेज २५ सूची में विषय नंबर ११९ में लिखा है:
“मौलाना अहमद रज़ा देवबंद (रह.) के फैज़ याफ्ता हैं”
नोट: आला हज़रत अलैहिर्रहमां को देवबंद का फैज़ याफ्ता कहने का दावा बे बुनियाद है |
२. यही इबारत पेज ४४८ पर भी लिखी है और इसी पेज पर विषय “अपने काम से काम” के तहत लिखा है:
“हम तो यह कहते हैं कि (हम बहुवचन के लिए आता है) मौलवी तय्यब कासमी साहब बताना चाहते है कि यह विचार मेरा ही नहीं बल्कि हमारा अहले देवबंद का विचार है द्वारा: अनुवादक ) ना मौलाना अहमद रज़ा (रह) को बुरा भला कहना जाएज़ समझते हैं ना कभी कहा |
अब क्या फरमाते हैं चरमपंथी देवबंदी अपने पूर्वजों उलमा के बारे मैं जो आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा खान अलैहिर्रहमां को ना मात्र मुस्लमान बल्कि रहमतुल्लाहि अलैह जैसे दूआईया  शब्दों से याद कर रहे हैं और आला हज़रत की अपमान को नाजाइज़ कहते हैं (आश्चर्य है उन देवबंदयूँ पर जो आला आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा खान अलैहिर्रहमां की अपमान करके बकौल उनके मुफ़्ती के नाजाइज़ काम कर रहे हैं) |
देवबंदियो ! अभी यह नहीं अधीक हवाला देखो और अपने गलत विचार से तौबा करो |
३. इसी पुस्तक के पेज ४४७ पर विषय “बरेलवी आलिम की तौहीन भी दुरुस्त नहीं” के तहत लिखा है “अब मौलाना अहमद रज़ा खान साहब हैं ……… एक दिन हज़रत थानवी (थानवी के नाम के साथ दुआइया शब्द हज़फ (हटाना) कर दिया है गुस्ताख इस कालिमा के काबिल नहीं द्वारा: लेखक) की मजलिस में ……गालिबन (शायद) खवाजा उज़ैरुल हसन मजज़ूब साहब ने या किसी और ने यह लफ्ज़ कहा कि …….. “अहमद रज़ा यूँ कहता है”
बस हज़रत (अशर-फअली) बिगड़ गये, फ़रमाया आलिम तो हैं हमें तौहीन (अपमान) करने का क्या हक़ है ? क्यूँ नहीं तुमने मौलाना का लफ्ज़ (शब्द) कहा ???
गर्ज़ बहुत डांटा डपटा ….बहरहाल (अब मौलवी तय्यब कासमी साहब इस वाकिया से परिणाम निकालते हैं और कहते हैं) हम तो इस विधि पर हैं कि कतअन (बिल्कुल भी) (इमाम अहमद रज़ा खान) की बे हुर्मती जाइज़ नहीं समझते, काफ़िर व फ़ासिक़ कहना तो बड़ी चीज़ है |
मौजूदा देवबंदीयूँ को ख़ासकर उन आम सादा लोह (भोले भाले) देवबंदीयूँ को जो मौजूदा चरमपंथी देवबंदी मौलवीयूँ की बातों में आ कर इमाम अहले सुनत  अहमद रज़ा खान अलैहिर्रहमां को बुरा भला कहते हैं | समझ जाना चाहिए कि आला हज़रत अलैहिर्रहमां को बुरा भला कहना या उनको काफ़िर कहना सही नहीं और उनको तौबा करनी चाहिए और इस विचार में अपने पूर्वजों का मौकूफ  इख्तियार करना चाहिए कि मौलवी अशरफ अली थानवी ने मात्र ” इमाम अहमद रज़ा खान अलैहिर्रहमां के नाम के साथ मौलाना ना कहने के वजह से अपने खलीफा को खोब डांटा अगर कोई उसके सामने आला हज़रत को काफ़िर कह देता तो………???
4. और अब एक और हवाला इसी पुस्तक से देखो पेज नंबर ४६७ विषय “अफ्रातो ताफ्रीत फ़िर्का वरियत की बुनियाद है” के तहत लिखा है कि “मौलाना इमाम अहमद रज़ा खान और बरेल्वीयत के बारे में जहाँ तक इस्लाम का ताअल्लुक़ (संबंध) है तो आज तक कहीं उनकी तकफीर नहीं की गयी बहरहाल वह मुसलमान हैं” |
अल्लाह अल्लाह ! देवबंदियुं के हकीमुल इस्लाम ने तो डिग्री जारी कर दी कि बरेलवी यानी सुन्नी भी मुसलमान और इमाम अहमद रज़ा खान अलैहिर्रहमां भी मुसलमान, इसे कहते हैं “जादू जो सर चढ़ के बोले”
देवबंदियो ! तौबा करो उनके खिलाफ भोंकते हो जिनकी अपमान करना तुम्हारे पूर्वजों के नज़दीक जाएज़ नहीं ” में कहता हूँ ऐ देवबंदी मेरी ना मान अपने बड़े की तो मान”
मौलवी तय्यब कासमी के बारे में देवबंदी अमीरे शरियत मौलवी अताउल्लाहशाह बुखारी कहता था “मौलाना तय्यब नहीं उन में मौलाना कासिम नानो तोई की रूह (आत्मा) बोलती है”
 गोया यह बात भी देवबंदीयूँ की नज़दीक मौलवी तय्यब कासमी की अपनी नहीं बल्कि मौलवी कासिम की आत्मा ने कही है | अब तो देवबंदीयूँ को अपने बानी ए देवबंदियत मौलवी कासिम की बात मान लेनी चाहिए और आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा खान अलैहिर्रहमां को काफ़िर और गुस्ताख़ कहने से तौबा करनी चाहिए |
५. इसी तरह देवबंदी यूँ के माह नामा “अर्रशीद भाग ११ शुमारा नम्बर ६ अप्रैल १९८३ पेज ११” मुलाहिजा हो:
“किसी ने मौलाना अहमद रज़ा खान मरहूम के मृत्यु की खबर मौलाना थानवी को सुनाई आप ने मृत्यु की खबर सुन कर फ़रमाया इन्ना लिल्लाहि व इन्ना अलैहि राजेऊन (انا للہ و انا الیہ راجعون) मौलाना ने मेरे और मरे कुछ बुज़ुर्गू के संबंध में कुफ्र का फतवा दिया लेकिन में अलहम्दु लिल्लाह उनके संबंध सुए ज़न (बुरा गुमान) नहीं रखता उनको जिन पाठ पर विरोध था उन को इन पाठ का मतलब नेक निय्यती से काबिले इतराज़ (विरोध के योग्य) नज़र आया और हम नेक निय्यती के साथ इस मफहूम का इनकार करते हैं अल्लाह ताअला मौलाना की मगफिरत फरमायें”
आदरणीय पाठकों | आप ने यह हवाला भी मुलाहिजा फ़रमाया इस में आला हज़रत अलैहिर्रहमां के लिए मग्फिरत की दुआ करना खुद देवबंदीयूँ की हकीमुल उम्मत व मुजद्दिद मौलवी अशर फअली से साबित है | अब अगर आला हज़रत अलैहिर्रहमां मुआजल्लाह काफ़िर या गुस्ताख थे तो क्या काफ़िर व गुस्ताख के लिए मगफिरत की दुआ की जाती है ?
काफ़िर व गुस्ताख के लिए मग्फिरत की दुआ करने वाला क्या काफ़िर नहीं ?
क्या देवबंदी अब अपने मुजद्दिद मौलवी अशर-फअली को भी काफ़िर कहेंगे कि उसने बकौल चरमपंथी देवबंदीयूँ के एक (मुआज़ल्ला सुम्मा मुआज़ल्लाह) गुस्ताख के लिए दुआये मगफिरत की ?
मजीद इस में मुजद्दिद मौलवी अशर-फअली थानवी ने अपने कुफ्र को छुपाने के की प्रयास की है हालाँकि इसका कुफ्र प्रकट है जिस में किसी क़िस्म की व्याख्या  की गुंजाईश नहीं उलमाए अहले सुन्नत ने इनका खूब पीछा किया और लग भग २५० उलमा ए अरब शरीफ व बर्रे सगीर ने इनके कुफ्र का फतवा दिया लेकिन मौलवी साहब को तौबा की तौफीक ना हुवी |
५. इसी थानवी साहब से किसी ने पूछा कि बरेली वालों के पीछे नमाज़ हो जाएगी तो थानवी साहब ने कहा कि हाँ हो जाएगी हम उन्हें काफ़िर नहीं कहते असल लेख मुलाहेज़ा हो:
“एक शख्श ने पूछा कि बरेली वालों के पीछे नमाज़ पढ़ें तो नमाज़ हो जाएगी या नहीं ?
फ़रमाया: हाँ हम उनको काफ़िर नहीं कहते अगरचे वह हमें कहते हैं”
(क स सुल अकाबिर पेज २५२ अल मक्तबा अशरफिया जामिया अशरफिया फिरोजपूर रोड लाहोर)
७. इसी तरह मौलवी सय्यद अहमद रज़ा बिज्नोरी देवबंदी ने देवबंदीयूँ के बहुत बड़े अल्लामा मौलवी अनवर शाह कश्मीरी के मल्फूजात जमा किये हैं इसमें अहमद रज़ा बिज्नोरी देवबंदी साहब मौलवी अनवर शाह कश्मीरी का एक जवाब नक़ल करते हैं जो इस ने एक क़ाद्यानी को दिया लिखते हैं कि:
“मुख़्तार क़ाद्यानी” ने विरोध किया कि उलमा ए बरेलवी उलामा ए देवबंद पर फतवा देते हैं और उलमा ए देवबंद उलमा ए बरेलवी पर, इस पर शाह साहब ने फ़रमाया: मैं बतौर वकील तमाम जमाअते देवबंद की ओर से गुजारिश करता  हूँ कि हज़राते देवबंद उनकी तकफीर नहीं करते”
(मल्फूज़ते मुहद्दिस कश्मीरी पेज ६९ इदारा तालीफाते अशरफिया बैरोन बोहड़ गेट मुल्तान)
अब तो मजीद दो पूर्वजगुरु ए देवबंद की गवाही आ गयी कि देवबंदी विचार धारा के उलमा, बरेलवी विचार धारा के उलमा को काफ़िर नहीं कहते |
८. मौलवी ज़िया उर्रहमान फारूकी पूर्व उच्च संरक्षक सिपाहे सहाबा अपनी पुस्तक “तारीखी दस्तावेज़” पेज ६० पर यूँ विषय देते हैं:
“शिया के बारे में पहले अकाबेरीने इस्लाम के फ़तवा जात”
और फिर उन अकाबेरीने इस्लाम का उल्लेख करते हुवे आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा खान अलैहिर रहमान से संबंध पेज ६५ यूँ विषय देते हैं:
“फ़ाज़िले बरेलवी मौलाना अहमद रज़ा खान रहमतुल्लाहि अलैह”
तो पता चला कि देवबंदयूँ के उस प्रामाणिक आलिम के नज़दीक भी आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा खान रहमतुल्लाहि अलैह अकाबिरे उलमा ए इस्लाम में से हैं | लेकिन क्या करें कुछ चरमपंथीतत्वों के बहकाने की वजह से आज कल देवबंदी  आला हज़रत अलैहिर्रहमां को काफ़िर व गुस्ताख समझते हैं | (मुआज़ल्लाह)
आदरणीय पाठकों ! यह सब लिखने का मक़सद उन देवबंदी विचार धारा के लोगों  के सामने तथ्यों बयान करना है और उन्हें दअते गौर व फिक्र देना है कि उनकी विचार आला हज़रत अज़ीमुल बरकत मुजद्दीदे आज़म मौलाना अश्शाह इमाम अहमद रज़ा खान अलैहिर्रहमां से संबंध सही नहीं है और इनको काफिर कहना तो अल्लाह रब्बुल इज्ज़त के एक बहुत बड़े वली की गुस्ताखी और अपमान है जैसे कि निबंध में देवबंदी विचार धारा के ही आठ (८) प्रामाणिक गवाहूँ से यह बात साबित की गई कि आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा खान अलैहिर्रहमां की अपमान बिलकुल भी दुरुस्त नहीं और उन्हें मुआज़ल्लाह काफ़िर कहना तो खुद पर कुफ्र का लागू  करना है |
अल्लाह तअला की दरबार में प्रार्थना है कि मेरी इस लेख को मसलमानों के लिए लाभ दायक बनाये और देवबंदी देवबंदी विचार धारा के लोगों को अपने गलत विचार से तौबा की तौफीक अता फरमायें आमीन………..
बिजा हुन्नाबियुल अमीन सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम
लेखक: अबू मुहम्मद शाने रज़ा कादरी बरकती
Email: shaneraza2526@gmail.com
अनुवादक: आले रसूल अहमद अल-अशरफी अल-क़ादरी
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