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चूल्हा-चौका फाइल बच्चे दिन भर उलझी रहती है

चूल्हा-चौका फाइल बच्चे दिन भर उलझी रहती है
वह घर में और दफ़तर में अब आधी-आधी रहती है

मिलकर बैठें दुःख सुख बाटें इतना हमको वक़्त कहाँ
दिन उगने से रात गये तक आपा-धापी रहती है

जिस दिन से तकरार हुई उन स्याह गुलाबी होंठों में
दो कजरारी आँखों के संग छत भी जागी रहती है

जब से पछुआ पवनें घर में आना जाना आम हुईं
तुलसी मेरे आँगन में कुछ सहमी-सहमी रहती है

क्या अब भी घुलती हैं रातें चाँद परी की बातों में
क्या तेरे आँगन में अब भी बूढ़ी दादी रहती है
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