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कहानी - नया मोड़ !

पेश है एक प्रेरणादायक कहानी "नया मोड़". मुझे ये कहानी काफी अच्छी लगी इसलिए आपलोगों के साथ भी शेयर कर रहा हूँ.

उस दिन नागेश ने जल्दी-जल्दी अपना कार्य समाप्त किया । अपने औजार बैग में ड़ाले और साहब के आने की प्रतीक्षा करने लगा। थोड़ी देर के बाद साहब तो नहीं उनका अर्दली बाहर आया । नागेश ने उसे सभी स्विच ऑन करके दिखाए तथा अन्य ठीक किया सामान उसको सौंपते हुए उससे बोला,‘‘सारा काम हो गया है। साहब से पूछ कर बताएँ कि क्या अब मैं जा सकता हूँ।“ थोड़ी देर में साहब अन्दर से आए उन्होंने स्वयं सभी चीज़ों का निरीक्षण किया और बोले ,‘‘धन्यवाद, तुम्हें कष्ट दिया । ठहरो जरा चाय पी कर जाना। ’’ और अर्दली रामलाल की ओर इशारा किया ।

“ सर, चाय पीने का मेरा जरा भी मन नहीं है, यदि आपकी अनुमति हो तो मैं जाऊँ।“

‘‘ फिर जैसी तुम्हारी इच्छा ”


नागेश ने साहब को स्लूट किया अपना बैग उठाया और चल पड़ा । वह शीघ्र ही ऐसे स्थान पर जाना चाहता था जहाँ वह थोड़ी देर तक पढ़ सके । उसने बी. ए. प्रथम का दाखिला भर रखा था । परीक्षा का निकट का समय नजदीक आ गया था पिछले कल रोल नम्बर भी पहुँच चुका था। कार्य की व्यस्तता के कारण उसे अपनी पाठ्य पुस्तकों को एक बार भी सही तरीके से पढ़ने का अवसर भी नहीं मिला था। पुलिस की नौकरी और साथ में तकनीकी कार्य। कहीं न कहीं किसी अधिकारी के कार्यालय या घर पर बिजली खराब हो जाती थी और तत्काल फोन पर बुलावा आ जाता था। यूँ भी पुलिस लाईन की बैरक मैं रह कर पढ़ाई करना उस समय अपने आप में एक नई बात थी।

यूँ भी एक हाल नुमा कमरे में दोनों ओर बीस-बीस पुलिस कर्मियों के बिस्तर लगे रहते हैं । कोई डयूटी पर जा रहा है तो कोई आ रहा है, तो कभी कोई जोर जोर से किसी घटना का वर्णन कर रहा है। अन्य साथी उसका आनन्द ले और आगे सुनाने के लिए कह रहे है,कभी जोर जोर से ठहाका लगाते है तो कभी उसकी बात में अपनी बात जोड़ कर कुछ कहने लगते है। उधर किसी कोने में चार लोग ताश की बाजी लगाए बैठे हैं तो साथ ही दो चार दर्शक उन्हें घेर कर खड़े हो जाते हैं तथा खिलाड़ियों बाजी देखने के साथ-साथ बीच -बीच में अपनी सलाह देते रहते हैं और बाजी खत्म होने पर अपना-अपना तपसरा देने से पीछे नहीं रहते। ऐसे वातावरण में पढ़ना असंभव नहीं तो एक दुष्कर कार्य अवश्य है ।

यदि हम गहराई से देखें तो पुलिस कर्मी का हर दिन एक नवीन अनुभव ले कर आता है। प्रतिदिन नए-नए लोगों से सम्पर्क होता है। नौकरी ही ऐसी है कि कभी कभी तो खाना खाने का समय नहीं लगता । वैसे भी आठ पहर यानि कि चौबीस घण्टे की नौकरी है। काम नहीं भी है तब भी अपने क्षेत्र को छोड़कर बाहर नहीं जाया जा सकता न जाने कब कोई अमरजैंसी आ पड़े। कब बिगुल बज जाए और फालन होना पड़े। यही कारण है कि वरिष्ठ अधिकारी भी अपने अधीनस्थ कर्मचारियों के अवकाश के प्रार्थना पत्र को स्वीकार करते हुए हिचकिचाते हैं। वे सोचते हैं कि भगवान न करे अचानक कोई दुर्घटना घटित हो गई या बीच में किसी विशिष्ट व्यक्ति का कार्यक्रम आ गया और नफ़री की कमी पड़ गई तो वे अपने उच्च अधिकारियों को क्या उत्तर देंगे। यूँ भी कमरों में बैठे व्यक्तियों को एकत्रित करने उनके वर्दी पहनने तथा नियत स्थान में पहुँचने में कुछ तो समय लगता ही है। इसी अवधि के दौरान लोगों में हलचल मच जाती है, दूरदर्शन पर तत्काल ब्रेकिंग न्यूज आने लगती है कि पुलिस प्रशासन स सोया है मौके पर अभी कोई पुलिस कर्मी नहीं पहुँचा। वे इतना नहीं समझते कि दुर्घटनाएँ कभी बता कर नहीं आती। यदि कोई पूर्व नियोजित कार्यक्रम हो और पुलिस कर्मी न पहुँचे तो बात जँचती है परन्तु अकस्मात हुए हादसों में एक दम ही पुलिस की छवि को धूमिल करना उनके उत्साह को कम करना ही कहा जा सकता है।

नागेश था तो पुलिस कर्मी ही परन्तु उसने क्योंकि इलैक्ट्रीशियन का भी डिप्लोमा कर रखा था इसलिए उससे तकनीकी कार्य अधिक लिया जाता था परन्तु जब कभी फोर्स की कमी होती थी तो उसे वर्दी पहन कर भी अपने कर्त्तव्यों का पालन करना पड़ता था। इन परिस्थितियों में भी वह अपनी आगामी शिक्षा को जारी रखना चाहता था। वह कोई न कोई पुस्तक अपने बैग में रखता था। वह कभी एकांत मार्ग में चलते चलते या किसी उचित स्थान में एकांत में बैठ कर पुस्तक के कुछ पन्ने पढ़ लेता था ।

आज भी जैसे वह साहब के बँगले से बाहर निकला वह जल्दी-जल्दी लक्कड़ ब़ाजार होते हुए मालरोड़ पहुँचा और रेलवेबोर्ड की बिल्ड़िंग की ओर चल पड़ा। उसे रास्ते में कई जान पहचान वाले मिले परन्तु उसने उनसे चलती सी बात की । वह रेलवे बोर्ड की बिल्ड़िंग पार कर गार्डन कैसल जिसमें महालेखाकार का कार्यालय है के पास पहुँचा । वह अक्सर इसकी बाईं ओर से विधान सभा को जाने वाले मार्ग के किनारे बने बैंच पर बैठ कर पढ़ लिया करता था । आज भी उसने मन ही मन विचार किया कि वह वहाँ बैठ कर कुछ समय पढे़गा । अपनी मन की एकाग्रता बनाने के लिए उसने दाहिनी ओर पनवाड़ी की दुकान से चार फोर सक्वेयर की सिगरेट खरीदी । डिब्बी से एक सिगरेट निकाल उसने पास की जलती हुई रस्सी सें जलाई और फिर वह उसी बैंच की ओर चल पड़ा। बैंच पर उसने अपना बैग एक ओर रखा और पुस्तक निकाल कर पढ़ने लगा।

उसी समय एक श्वेत वस्त्रधारी महाशय जिनकी लम्बी दाढ़ी थी मूछें कुछ कटी हुई थी और सिर पर मुसलमानी टोपी पहने हुए थे बैंच से थोड़ी दूर पर आकर खड़े हुए। उन्होंने अपने बाएँ हाथ में पकड़ी बाँस की टोकरी से एक छोटी सी चादर निकाली, उसे दोहरा कर ज़मीन पर बिछा दिया व अपनी चप्पल एक ओर खोल स्वयं उस पर बैठ गए। तत्पश्चात उन्होंने एक अखबार का टुकड़ा उस चादर पर बिछाया, टोकरी से दो आम निकाले और उस कागज़ पर रख दिए। थोड़ी देर बाद अपनी जेब चाकू निकाल कर उन्होंने उन आमों को करीने से काटा और खाने लगे।

नागेश ने अभी दो चार पृष्ठ ही पढ़े थे और उसकी सिगरेट जल कर फिल्टर तक आ गई थी । उसके पास माचिस नहीं थी इसलिए उसने दूसरी सिगरेट निकाली और पहली सिगरेट के साथ जोड़ कर सुलगा ली । उधर वे महाशय आम काट कर बड़े आराम से उसे खाने का आनन्द ले रहे थे। उधर कुछ समय बाद नागेश ने तीसरी सिगरेट भी पहले की तरह सुलगाई । यद्यपि वह पढ़ने में इतना मग्न हो जाता था कि सिगरेट बिना कश लगाए ही सुलगते सुलगते समाप्त हो जाती थी और जब अंगुली के पास गर्मी का आभास होता तो वह दूसरी सुलगा लेता । लगभग आधा पौने घंटे के बाद जब बैठे बैठे वह थकान का सा अनुभव करने लगा तो उसने खड़े हो पढ़ने क निश्चय किया | वह उठा और फिर इधर उधर टहलते हुए पढ़ते लगा। इस समय उसकी तीसरी सिगरेट भी समाप्त होने जा रही थी । वह थोड़ी देर रुक कर चौथी सिगरेट निकालने ही जा रहा था कि उस महाशय जो नागेश के लिए अजनबी था ने नागेश को सम्बोधित कर अंग्रेजी में कहना आरम्भ किया, ‘‘जंटलमैन यू आर स्मोकिंग एण्ड आई एम टेकिंग मैंगोज़ आर यू राईट और एम आई। ’’

नागेश उसके अंग्रेजी में कहे इस वाक्य को सुन स्तब्ध रहा और विस्फरित नेत्रों से उसको निहारने लगा। वह वे्यभूड्ढा से एक सिर पर टोकरी में फल उठाकर फल बेचने वाले फल विक्रेता से अधिक कुछ नहीं लगता था। उसके मुख से इस प्रकार अन्तर-राष्ट्रीय भाषा में वाक्य को सुन थोड़ा विचलित हुआ । सिगरेट का टुकड़ा कब उसके हाथ से नीचे गिर गया उसे पता ही नहीं चला । थोड़ी देर सोचने के बाद उसने उत्तर दिया , ‘‘सर यू आर एब्सोल्यूटलि राईट।’

इस वाक्य को सुन कर उन महाशय ने इतना ही कहा, “ दैन जैण्टलमैन लीव इट ।“

फिर अपना सामान एकत्रित किया और उस स्थान से चले गए । नागेश उनके बारे में सोचता ही रह गया । इससे पूर्व भी कई बार लोगों ने उसे सिगरेट पीने से मना किया था परन्तु उसका उसके मन पर अधिक प्रभाव नहीं पड़ा था परन्तु आज उस अजनबी व्यक्ति के शब्दों ने उसके मानस पटल को हिला कर रख दिया था । वह अब और नहीं पढ़ सका| बैंच पर से उसने अपना बैग उठाया पुस्तक उसमें ड़ाली और पुलिस लाईन की ओर चल पड़ा। रास्ते में पनवाड़ी की दुकान के सामने उसने सिगरेट लेनी चाही लेकिन ज्योंही उसने पैसों के लिए जेब में हाथ ड़ालना चाहा तत्काल उसकी आँखों में उसी महाशय का उपदेश देता हुआ चेहरा सामने आ गया । वह सिगरेट नहीं खरीद सका व आगे चल दिया। इस घटना ने उसके जीवन में नया मोड़ ला दिया।

आज इस घटना को कई वर्ष व्यतीत हो चुके हैं परन्तु नागेश ने सिगरेट को हाथ भी नहीं लगाया न पीने की बाट तो दूर रही। जितनी बार भी उसने सिगरेट को हाथ लगाने का प्रयास किया वही आकृति उसको अपनी आँखों के सामने घूमती दिखाई दी। वह अब भी अपने साथियों के मध्य इस घटना की चर्चा कर दिया करता है और उन महाशय को एक ऐसे गुरु का दर्जा प्रदान करता है जिसे ईश्वर या ईश्वरीय दूत माना जा सकता है। वास्तव में गुरु है ही वही जो व्यक्ति को अंधकार के मार्ग से निकाल कर संमार्ग की ओर ले जाए।
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