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सबसे बड़ा बुद्धिमान कौन ?

प्रस्तुत है एक ऐसी कहानी जिससे हम सब को एक बहुत बड़ी सिख मिलती है. हम उस युग में जी रहे हैं जहाँ हम अपने आप तक सिमट कर रह गए हैं. हम प्रतिदिन एक नयी ऊंचाई को छूना चाहते है चाहे इसके लिए हमें कितनो को दुःख पहुचना पड़े. बस हमें ख़ुशी मिलनी चाहिए. . . . . अगर हम जीवन के सच्चे सुख का अनुभव करना चाहते हैं तो वास्तव में अपने आप कुछ बदलाब करने की जरुरत है.

                   

आइये पढ़ते हैं ये प्रेरणादायक कहानी और समझते हैं इस तथ्य को........................




कुछ वर्ष पूर्व सीटल के विशेष ओलम्पिक खेलों की एक घटना है।
मानसिक एवं शारीरिक रूप से असक्षम युवाओंकी 100 मीटर की दौड़ के आयोजन का समय आ गया था। मानसिक एवं शारीरिक रूप से असक्षम प्रतिभागीबन्दूक की गोली चलने की प्रतीक्षा कर रहे थे। जैसे ही गोली चली, सभी प्रतिद्वन्दी प्रारंभिक रेखा से भागे और जीतनेकी प्रबल इच्छा को लेकर आगे बढ़ने लगे।

लेकिन एक छोटा लड़का लड़खड़ा कर शुरू में ही गिर गया और रोने लगा। बाकी आठ प्रतिभागियों ने उसके रोने की आवाज़ सुनी और उन आठों ने पीछे मुड़कर देखा। और फिर वह आठों के आठों वापस लौटे और उस बालक के पास पहुंचे।

एक बालिका जो "डाउन्स सिन्ड्रोम" नामक बीमारी से ग्रसित होने के कारण मानसिक एवं शारीरिक रूप से असामान्य थी, झुकी और उसने उस छोटे से बालक को प्यार से चूमा और बोली, " अरे कोई बात नहीं , अब तुम बिल्कुल ठीक से दौड़ोगे" ।

और इसके बाद जो भी हुआ उसे देखकर स्टेडियम में बैठे सभी दर्शकों ने दांतों तले उंगली दबा ली। इसके बाद नौ के नौ प्रतिभागियों ने एक दूसरे के हाथ पकड़ कर एक साथ भागना शुरू किया और सबने एक साथ 100 मीटर की अन्तिम रेखा पार की।

इस दौड़ के समाप्त होने के पश्चात स्टेडियम में उपस्थित अपार जनसमूह खड़ा हो गया और सबने मिलकर काफ़ी देर तक तालियाँ बजा कर इन शारीरिक एवं मानसिक रूप से असामान्य प्रतिभागियों का मनोबल बढाया।

जो लोग उस समय वहां उपस्थित थे वे आज तक अन्य लोगों को यह कहानी बड़े गर्व से सुनाते हैं। क्यों ? क्योंकि मन ही मन वह जानते हैं की हमारे जीवन में स्वयं जीतने से अधिक महत्वपूर्ण है जीतने में अन्य
लोगों की मदद करना, चाहे ऐसा करने में उन्हें अपनी गति कुछ कम ही करनी पड़े। चाहे ऐसा करने में उन्हें अपना मार्ग ही कुछ क्यों न बदलना पड़े।

" क्या दूसरी मोमबत्ती जलाने के बाद पहली मोमबत्ती की रौशनी धीमी पड़ जाती है ? "नहीं न" । क्या दूसरी मोमबत्ती को बुझा देने से पहली मोमबत्ती ज्यादा तेज़ी से चमकने लगती है ?

हम ये सभी चीज जानते हुए भी उस परिस्थिति में ढल नहीं पाते हैं उसका कारण क्या है? क्योंकि इस दुनिया में हम सिर्फ अपना भला चाहते हैं, बस हमें फायदा होना चाहिए.

हमें ये ज्ञात होना चाहिए कि हम इस सुन्दर पृथ्वी पर कुछ दिनों के मेहमान हैं, तो क्यों न इस समय को भरपूर जिया जाये. हम क्यों हमेशा कुछ पाने की चाह में लगे होते हैं. क्या करेंगे हम उन चीजो को जमा कर.

क्यों हम इस पृथ्वी पर मुर्ख बन कर जीते रहें, हमें बुद्धिमान होने का अवसर मिला है, और इसे किसी भी कीमत पर नहीं गवाना चाहिए.

तो बड़ा कीजिये अब आप इस जीवन को बुद्धिमान बनकर जीने बाले हैं, मुर्ख बन कर नहीं !
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