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आखिर कैसे भूल पायें अपने प्यार के गम

हेलो दोस्तो! हम चाहे जितना भी फूंक-फूंककर कदम रखें पर कई बार परिस्थितियाँ हमारी आशाओं के बिल्कुल विपरीत ही बनती हैं। लाख चाह कर भी हम उन हालात में खुद को एडजस्ट नहीं कर पाते हैं। कभी सालों से चल रहा प्रेम टूट जाता है तो कभी किसी मजबूरीवश एक-दूसरे से दूर जाना पड़ता है। कभी आपस की गलतफहमियाँ इतनी गहरा जाती हैं कि उसके कुहासे को हटा पाना असंभव सा हो जाता है। ऐसे अवसरों पर सारा सुख-चैन छिन जाता है।

जी यही चाहता है कि कोई ऐसी तरकीब हो जिससे जीवन जीना सामान्य हो जाए। कोई ऐसी दवा हो जिससे जीवन में चैन व सुकून बरकरार हो जाए। पर, अफसोस ऐसी कोई भी दवा नहीं बनी है जिसको खाते ही मनुष्य पुरानी तमाम कड़वी बातें भूल जाए और वह अचानक चहकने लगे।

कोई औषधि न बनी हो पर कुछ तरीके जरूर आजमाकर देखे गए हैं जिससे धीरे-धीरे ही सही बुरी यादों से छुटकारा मिलता जाता है और मन शांत होता जाता है। यदि आप शिक्षित हैं तो यह ऐसे हालात में वरदान के समान है। अपनी पसंद की कोई किताब पढ़ें।

जासूसी, रोमांटिक, ट्रेजडी, हँसी-मजाक वाली किताब पढ़ने से आपका मन अपने विषय से हटकर उस किताब के विषय के बारे में सोचने लगेगा। जो भी कहानी, उपन्यास, कविता चुनें, ऐसी चुनें जिसमें आपका मन रमता जाए। अपने पसंदीदा लेखक को ही पढ़ना शुरू करें।

आपको पता भी नहीं चलेगा और उसका प्लॉट आपके दुख के प्लॉट पर हावी होता जाएगा। उसके चरित्र आपको आकर्षित करेंगे और कुछ नया सोचने के लिए बाध्य करेंगे। आप अपनी सुविधानुसार उसके चरित्रों के नैन-नक्श और हाव-भाव गढ़ने में लग जाएँगे। इसके कारण वर्तमान दुख से आपको छुटकारा मिलेगा।

लिखने से भी आपको बेहद आराम मिल सकता है। कहते हैं दुख कई बार आपको लेखक बना देता है। भले ही वह लिखी हुई चीज कहीं न छपे पर जब आप अपने मन की बात कागज पर लिखना शुरू करेंगे तो उसे लिखने की कोशिश में भाषा, विषय, भावना आदि को तारतम्य रूप से रखने की चेष्टा आपको इतना व्यस्त कर देगी कि आप दुख की पीड़ा को एक ओर रख देंगे। यदि आपने कुछ और ही विषय चुना है, अपनी कोई पुरानी घटना, उसे याद करके लिखना और भी अच्छा है।

जैसे-जैसे वह घटना याद आएगी और आप उसे संजोकर लिखते जाएंगे वैसे-वैसे दिमाग वर्तमान विषादमय घटना को खालीकर उस पुरानी घटना को भरता जाएगा। दिमाग को तत्काल पीड़ा से खाली करने का इससे बेहतर उपाय नहीं है।

फिल्में भी परेशान मन को बहुत राहत देती हैं। फिल्म में यह फायदा है कि बिना किसी कष्ट के आप तीन घंटे या कहें कि चार-पांच घंटे तक उससे बंधे रहते हैं। हॉल में फिल्म देखते समय आप कुछ और सोच नहीं सकते हैं। उस फिल्म का फिल्मांकन एवं थीम आपके दिमाग को अपने नियंत्रण में कर लेता है।

अपनी पसंदीदा फिल्मों को भी फिर से देख सकते हैं। उसका अहसास अच्छा होता है क्योंकि आप दुख की हालत में भी आनंद लेने का अनुभव महसूस कर सकते हैं। दिमाग और मन को बार-बार एक ही बात की खिचड़ी पकाने से भी निजात मिलती है।

अपनी कोई पुरानी हॉबी जिसे आप वर्षों से भूल गए हों उसे एक बार याद करने और दुहराने की कोशिश करें। पेंटिंग, मिट्टी से कुछ गढ़ना, गाना गाना, नाच सीखना, बाजार घूमना, बच्चों से बातें करना, उनके साथ कुछ गेम खेलना, पहेली हल करना जो कुछ भी आपको अच्छा लगता हो, जिसमें मजा आता हो करना शुरू कर दें। ऐसी रचनात्मकता में पीड़ा कम आनंद ज्यादा है।

यदि आपको पतंग उड़ाने का शौक रहा है तो उड़ाएं। ये सारे कार्य इतने रोचक हैं कि एक बार भी आपने जी कड़ाकर के इन्हें करना शुरू कर दिया तो उसका नशा सा सवार हो जाता है। और यकीन मानें दुख का नशा उतरने लगता है। इससे जीने की चाहत पनपती है और नकारात्मक बातें मन को तोड़ना बंद कर देती हैं।

सब बुरे हैं यह सोचने के बजाय जिन लोगों से स्नेह, दोस्ती है उसके लिए उपहार खरीदें। उपहार के लिए समय निकालकर बाजार में घूमें, तरह-तरह की नई चीजों को देखें और प्यार से अपनी जेब के अनुसार तोहफा खरीदें। उस व्यक्ति से अपनी ओर से पहल कर मिलें और तोहफा दें। अपने खाली स्थान को भरने के लिए दोस्तों, प्यारे रिश्तेदारों का साथ जरूरी होता है। थोड़ा झुकने में कोई बुराई नहीं है। विश्वास करें बहुत संबल मिलेगा।

किसी जरूरतमंद की मदद करें। इससे बहुत सुकून मिलता है। आसपास कोई समाज सेवा चल रही हो तो उसमें भाग लें। नया अनुभव और नए लोग किसी भी जख्म को भरने में बहुत कारगर होते हैं। यह सच है कि हर क्रिया की वैसी ही गति से प्रतिक्रिया भी होती है। इसीलिए जब भी आप कुछ अच्छा करेंगे, सोचेंगे, आप पर वैसा ही असर होगा।

अपने आसपास के माहौल का भी जायजा लेना चाहिए तब आपको पता चलेगा कि आप बहुतों से बेहतर स्थिति में हैं। यह सोच-समझ आपको जीवन का नए सिरे से आगाज का हौंसला देगा।
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