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Mix Shayri collection 45 / एक से बढ़ कर एक चुनिन्दा मिक्स शायरी संग्रह 45

अब के आना तो मेरे शहर की मिट्टी लाना...

इससे बेहतर कोई तोहफा , कोई सौगात नहीं.....
ये रौशनी जो अंधेरों से होकर आई है...

ना जाने कितना निचोड़ा है जुगनुओं का लहू.....
उस दशत में चिराग जलाना कमाल है,जिस दशत में हवाएँ नहीं ...आंधियाँ चलें।
मैंने ही मैखाने को मैखाना बनाया,,,,ओर मेरे ही मुक़द्दर में कोई जाम नहीं...
जाने लगे जब वो छोड़ कर दामन मेरा,टूटे दिल ने हिमाकत करदी,,,,सोचा था छुपा लेंगे गम अपना....पर कंबखत आँखों ने बगावत करदी।
ऐ जिंदगी तू मुजसे ये दगा न कर... में ज़िंदा रहूँ उसके बिना,,ये दुआ न क ...कोई देखता है उनको तो होती है जलन...ऐ हवा तो भी उसे छुआ न कर।
मेरे पास भी कुछ शेयर पड़े है,उनमे से कुछ पेश किए है।आपकी इजाजत के बिना पोस्ट किए है उसके लिए क्षमाप्रार्थी हों। अगर आप बुरा न माने तो क्या आगे ओर भी पोस्ट कर सकया हूँ (अगर किसी को पसंद भी आए तो)
किसी को मकां मिला,किसी के हिस्से में दुकां आई,

मैं घर में सबसे छोटा था,मेरे हिस्से में माँ आई.....
वाह कितनी गहरी और शानदारबात कही मित्र
रंजिश ही सही , दिल को दुखाने के लिए आ,

आ फिर से मुझे , छोड़ जाने के लिए आ.....



जिंदगी में खूब कमाया , क्या हीरे क्या मोती ,

क्या करूँ मगर कफ़न में जेबें नहीं होती......

वाह वाह अभी और कितने टेलेन्ट दिखाने बाकि हे मित्र
यही है ज़िन्दगी कुछ ख्वाब, चंद उम्मीदें
इन्हीं खिलौनों से तुम भी बहल सको तो चलो
-निदा फाजली
दिल में है उमंग, कफ़न में जेब नहीं तो क्या?
कमाते चलो उड़ाते चलो...दुनिया हमसे जले तो क्या??


जिंदगी में खूब कमाया , क्या हीरे क्या मोती ,

क्या करूँ मगर कफ़न में जेबें नहीं होती......
जहां पेड़ पर चार दाने लगे,
हज़ारों तरफ से निशाने लगे
ये भी एक तमाशा है बाज़ार-ए-उल्फत में ''ग़ालिब''
दिल किसी का होता है और बस किसी का चलता है
यह दुनिया एक लम्हे में तुम्हे बर्बाद कर देगी,
मोहब्बत मिल भी जाये तो उसे मशहूर मत करना
वो बरसों बाद मिला तो गले से लिपट कर रोने लगा,
जाते हुए जिसने कहा था तुम जैसे लाखों मिलेंगे
उसकी हथेली पर अपना नाम देख कर बहुत ख़ुशी हुई,
उसने बड़े मासूम लहजे में कहा तेरे हमनाम और भी हैं
गले लिपटे है वो बिजली के डर से,
इलाही ये घटा दो दिन तो बरसे
सबब रोने का अगर पूछे वो, तो फक़त इतना कह देना
मुझे हँसना नहीं आता, जहाँ पर तुम नहीं होते
ये मेरी जीस्त की सबसे बड़ी तमन्ना थी,
वो मेरे पास मेरे नाम की तरह रहता
क्या हुस्न क्या ज़माल है क्या रंग रूप है,
वो भीड़ में भी जाये तो तन्हा दिखाई दे
ए आलम-ए-वक़्त कोई ऐसा फतवा दे,
जो मोहब्बत में वफ़ा न करे वो काफ़िर ठहरे
ग़रीब-ए-शहर तो फाके से मर गया,
अमीर-ए-शहर ने हीरे से ख़ुदकुशी कर ली
मैं खुदा की नज़रों में भी गुनाहगार होता हूँ,
जब सजदों में भी मुझे वो शख्स याद आता है
कितने मासूम है ज़माने के लोग,
क़त्ल करके पूछते हैं जनाज़ा किसका है
पुछा जो उसने चाँद निकलता है किस तरह?
जुल्फों को रुख पे डाल के झटका दिया, के यूँ
शहर भर में मजदूर जैसे दर-बदर कोई न था,
जिसने सबका घर बनाया, उसका घर कोई न था...

ना कर प्यार इतना की बेवफा बन जाये ...
संभल जा ज़िन्दगी अभी बाकि है कही औत ना हो जाये
क्या बात हे रिहान जी बहुत जबरदस्त शायरियां हे


इस बेहतरीन शेर के लिए REPUTATION कबूल करें....
उत्साह बढाकर मन प्रसन्न कर दिया मित्र आपने
आप दोनों का ह्रदय से आभारी हूँ
आशा है ऐसे ही होसला बढ़ाते रहेंगे..

सीने से लगा के कहा करती थी माँ मुझ को
तू लाल है मेरा ना सता मुझको
पछताएगा इक दिन जब मैं चली जाऊँगी
ना चाहते हुए भी अकेला छोड़ जाऊँगी
ज़माना दिखाएगा गर्मी की शिद्दत तुझको
याद करके रोएगा तू फिर मुझको
मुद्दत से मेरी माँ ने सीने से नहीं लगाया
अब सो गयी ख़ाक में जब कुछ कहने का वक़्त आया
सीने से लगा के कहा करती थी माँ मुझ को
तू लाल है मेरा ना सता मुझको
पछताएगा इक दिन जब मैं चली जाऊँगी
ना चाहते हुए भी अकेला छोड़ जाऊँगी
ज़माना दिखाएगा गर्मी की शिद्दत तुझको
याद करके रोएगा तू फिर मुझको
मुद्दत से मेरी माँ ने सीने से नहीं लगाया
अब सो गयी ख़ाक में जब कुछ कहने का वक़्त आया


दोस्त,

ये अब तक की सबसे सर्वश्रेष्ट रचना है इस सूत्र पर.

इसके लिए आपको दोबारा REPUTATION तो नहीं दे पा रहा हूँ,

लेकिन आपने अब तक की सबसे बेस्ट रचना दी,जो दिल को छू गयी.:salut:

आप के शेरों का सदैव इंतज़ार रहेगा.
आपका फिर से आभारी हूँ मित्र
बहुत बहुत शुक्रिया
जाहिद शराब पीने दे मस्जिद में बैठकर
या वो जगह दिखा दे जहाँ खुदा न हो
हर दवा दर्द को बढ़ा ही दे
अब तो इ दिल उसे भुला ही दे
जीते जी मुझे उठाकर ,वो दफनाने को ले चले
दो चार नफज बची थी , वो और इंतजार न कर सके
उसको देखते ही मुझे मौत आ जाये
वो कितने हसीन हे ,उन्हें यकीं तो आये
वो पूछते हे की दर्द क्या यहाँ क्या यहाँ हे
नादान को इतना भी नाही मालूम की दिल होता कहा हे
हमने यह सोचकर साकी को गले से लगाया हे
की इसको भी तो खुदा ने कुछ सोचकर बनाया हे
हर दवा दर्द को बढ़ा ही दे
अब तो इ दिल उसे भुला ही दे


बहुत खूब दोस्त,

बेहतरीन शायरियां..

और भी पोस्ट करिए....
सबनेमिलाये हाथ यहाँ तीरगी के साथ ,

कितना बड़ा मज़ाक हुआ रौशनी के साथ ।

किस काम की रही ये दिखावे की ज़िन्दगी,

वादे किये किसी से गुजारी किसी के साथ ।
करके मोहब्बत अपनी खता हो.. ऐसा भी हो सकता है..
वोह अब भी पाबंद-ए-वफ़ा हो.. ऐसा भी हो सकता है..
अब “दोस्त” मैं कहूं या, उनको कहूं मैं “दुश्मन”..
जो मुस्कुरा रहे हैं,खंजर छुपा के अपने पीछे..

तुम चांद बनके जानम, इतराओ चाहे जितना..
पर उसको याद रखना, रोशन हो जिसके पीछे..
ये जो ज़िन्दगी की किताब है..
ये किताब भी क्या खिताब है..
कहीं एक हसीं सा ख्वाब है..
कही जान-लेवा अज़ाब है..
वो दिल ही क्या जो तेरे मिलने की दुआ ना करे..

मैं तुझको भूल के ज़िन्दा रहूं, ये खुदा ना करे..
आंख से आंख मिला, बात बनाता क्यूं है..

तू अगर मुझसे खफ़ा है, तो छिपाता क्यूं है..?
उजड़ी-उजड़ी सी हर एक आस लगे
जिन्दगी राम का वनवास लगे
तू कि बहती हुई नदिया के समान
तुझको देखूँ तो मुझे प्यास लगे
ये हमसे न होगा कि किसी एक को चाहें
अय इश्क़ हमारी न तेरे साथ बनेगी
उस नज़र की उस बदन की गुनगुनाहट तो सुनो
एक-सी होती है हर इक रागिनी ये मत कहो
सोचो तो बडी चीज़ है तहज़ीब बदन की
वरना तो बदन आग बुझाने के लिए है
कहते हैं किसे प्यार ज़माने को दिखा दे
दुनिया की नज़र इश्क़ के क़दमों पे झुका दे
दीवाना महब्बत का कहीं डर के रुका है
दरबार में शाहों के कहीं इश्क़ झुका है
ज़िन्दगी ये तो नहीं तुझको सँवारा ही न हो
कुछ न कुछ हमने तेरा कर्ज़ उतारा ही न हो
शर्म आती है कि उस शह में हम हैं कि जहाँ
न मिले भीक तो लाखों का गुज़ारा ही न हो
देते हैं जो दर्द ,

वोही कहलाते हैं हमदर्द....
तन्हाई का एक और मज़ा लूट रहा हूँ ,

मेहमां मेरे घर में बहुत आये हुए हैं.....
पत्थर हमारे सहन में आये ,ख़ुशी हुयी ,

गम तो गया की लोग हमे जानते नहीं.....
अपनी मर्ज़ी के मुताबिक कब दुनिया किसको मिली ,

दुनियादारी भी ज़रुरत है , चलो यूँ ही सही.....
जाहिद शराब पीने दे मस्जिद में बैठकर
या वो जगह दिखा दे जहाँ खुदा न हो
अच्छी शायरी पेश की है मित्र
इस शेर पर इन महान शायरों ने कुछ इस तरह तुकबंदियाँ की

ग़ालिब:-
जाहिद शराब पीने दे मस्जिद में बैठकर,
या वो जगह बता जहाँ खुदा नहीं..
इकबाल:-
मस्जिद खुदा का घर है पीने की जगह नहीं,
काफ़िर के दिल में जा वहां खुदा नहीं..
फ़राज़:-
काफ़िर के दिल से आया हूँ मैं ये देखकर,
खुदा मौजूद है वहां उसको पता नहीं..
पत्थर हमारे सहन में आये ,ख़ुशी हुयी ,

गम तो गया की लोग हमे जानते नहीं.....
ये लोग अजनबी हैं तो पत्थर कहाँ से आये,
इस भीड़ में भी कोई तो अपना जरूर है
ये लोग अजनबी हैं तो पत्थर कहाँ से आये,
इस भीड़ में भी कोई तो अपना जरूर है


मैं भी ज़ख्म-ज़ख्म मेरा दिल भी दागदार,

मुझ पर भी दोस्तों की नवाजिश बहुत हुयी....
मैं भी ज़ख्म-ज़ख्म मेरा दिल भी दागदार,

मुझ पर भी दोस्तों की नवाजिश बहुत हुयी....
हँसने पे भी आ जाते हैं बेसख्त आंसू,
कुछ लोग मुझे ऐसी दुआ देके गए हैं...
सब के होंटो पे तबस्सुम था मेरे क़त्ल के बाद,
जाने क्या सोच कर रोता रहा क़ातिल मेरा...
बिछड़ कर रोज मिलता है वो मुझे वो ख्वाब-ए-नगर में,
अगर ये नींद ना होती तो मर गए होते....
सख्त राहों पे भी आसान सफ़र लगता है,
ये मेरी माँ की दुआओं का असर लगता है...
मज़ा देती हैं उनको ज़िन्दगी की ठोकरें "मोहसिन"
जिन्हें नाम-ए-खुदा लेकर संभल जाने की आदत है...
वो हुस्न-ओ-जमाल उनका ये इश्क़-ओ-शबाब अपना
जीने की तमन्ना है मरने का ज़माना
हम इश्क़ के मारों का इतना ही फ़साना है
रोने को नहीं कोई हँसने को ज़माना है

वो और वफ़ा-दुश्मन मानेंगे न माना है
सब दिल की शरारत है आँखों का बहाना है

क्या हुस्न ने समझा है क्या इश्क़ ने जाना है
हम ख़ाक-नशीनों[5] की ठोकर में ज़माना है

इक लफ़्ज़े-मोहब्बत[1] का अदना[2] ये फ़साना है
सिमटे तो दिल-ए-आशिक़ फैले तो ज़माना है

ये किसका तसव्वुर[3] है ये किसका फ़साना है
जो अश्क है आँखों में तस्बीह[4] का दाना है

हम इश्क़ के मारों का इतना ही फ़साना है
रोने को नहीं कोई हँसने को ज़माना है

वो और वफ़ा-दुश्मन मानेंगे न माना है
सब दिल की शरारत है आँखों का बहाना है

क्या हुस्न ने समझा है क्या इश्क़ ने जाना है
हम ख़ाक-नशीनों[5] की ठोकर में ज़माना है

वो हुस्न-ओ-जमाल उनका ये इश्क़-ओ-शबाब अपना
जीने की तमन्ना है मरने का ज़माना है

या वो थे ख़फ़ा हमसे या हम थे ख़फ़ा उनसे
कल उनका ज़माना था आज अपना ज़माना है

अश्कों के तबस्सुम[6] में आहों के तरन्नुम[7] में
मासूम मोहब्बत का मासूम फ़साना है

आँखों में नमी-सी है चुप-चुप-से वो बैठे हैं
नाज़ुक-सी निगाहों में नाज़ुक-सा फ़साना है

ऐ इश्क़े-जुनूँ-पेशा[8] हाँ इश्क़े-जुनूँ-पेशा
आज एक सितमगर[9] को हँस-हँस के रुलाना है

ये इश्क़ नहीं आसाँ इतना तो समझ लीजे
एक आग का दरिया है और डूब के जाना है

आँसू तो बहुत से हैं आँखों में 'जिगर' लेकिन
बिँध जाये सो मोती है रह जाये सो दाना है


शब्दार्थ:

↑ प्रेम के शब्द का
↑ तुच्छ
↑ कल्पना
↑ माला
↑ मिट्टी या धरती पर रहने वाले
↑ मुस्कुराहट
↑ गेयता
↑ उन्मादी प्रेम
↑ अत्याचारी
जो मरते है उलझ कर किनारों पे,दुःख उनपर होता है ,
बीच समन्दर में फ़ना होना तो किस्मत की बात है
जिसे तू कुबूल कर ले वह अदा कहाँ से लाऊँ
तेरे दिल को जो लुभाए वह सदा कहाँ से लाऊँ
कभी ख़ुद पे, कभी हालात पे रोना आया ।
बात निकली तो हर एक बात पे रोना आया ॥

हम तो समझे थे कि हम भूल गए हैं उन को ।
क्या हुआ आज, यह किस बात पे रोना आया ?
दूर वादी में दूधिया बादल,झुक के परबत को प्यार करते हैं
दिल में नाकाम हसरतें लेकर,हम तेरा इंतज़ार करते हैं
इन बहारों के साए में आ जा,फिर मोहब्बत जवाँ रहे न रहे
ज़िन्दगी तेरे ना-मुरादों पर,कल तलक मेहरबाँ रहे न रहे
रोज़ की तरह आज भी तारे,सुबह की गर्द में न खो जाएँ
आ तेरे गम़ में जागती आँखें,कम से कम एक रात सो जाएँ
हमसे पूछनी है तो सितारों की बातें पूछो
ख्वाबों की बातें तो वो करते हैं जिन्हें नींद आती है
जब तुम ही नहीं हो तो ज़माने से मुझे क्या
ठहरे हुए जज़्बात में जाँ है भी नहीं भी
इबादत करते हैं जो लोग जन्नत की तमन्ना में
इबादत तो नहीं है इक तरह की वो तिजारत है
हवाएं ज़ोर कितना ही लगाएँ आँधियाँ बनकर
मगर जो घिर के आता है वो बादल छा ही जाता है

क़सम है आपके हर रोज़ रूठ जाने की
के अब हवस है अजल को गले लगाने की

वहाँ से है मेरी हिम्मत की इब्तिदा अल्लाह
जो इंतिहा है तेरे सब्र आज़माने की
किस को आती है मसिहाई किसे आवाज़ दूँ
बोल ऐ ख़ूं ख़ार तनहाई किसे आवाज़ दूँ

चुप रहूँ तो हर नफ़स डसता है नागन की तरह
आह भरने में है रुसवाई किसे आवाज़ दूँ
जिएँ तो अपने बग़ीचे में गुलमोहर के तले
मरें तो ग़ैर की गलियों में गुलमोहर के लिए
कौन कहता है आसमान में सूराख़ नहीं होता
एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो

:- दुष्यंत कुमार
जिएँ तो अपने बग़ीचे में गुलमोहर के तले
मरें तो ग़ैर की गलियों में गुलमोहर के लिए
सब के होंटो पे तबस्सुम था मेरे क़त्ल के बाद,
जाने क्या सोच कर रोता रहा क़ातिल मेरा...


पत्थर की जो लकीर थे,वे लोग मिट गए,

हम ऐसे नक्श थे की हवा पर बने रहे....
ख़ुदा नहीं न सही आदमी का ख़्वाब सही
कोई हसीन नज़ारा तो है नज़र के लिए

वो मुतमइन हैं कि पत्थर पिघल नहीं सकता
मैं बेक़रार हूँ आवाज़ में असर के लिए
ये सारा जिस्म झुक कर बोझ से दुहरा हुआ होगा
मैं सजदे में नहीं था आपको धोखा हुआ होगा

यहाँ तक आते-आते सूख जाती हैं कई नदियाँ
मुझे मालूम है पानी कहाँ ठहरा हुआ होगा

ग़ज़ब ये है कि अपनी मौत की आहट नहीं सुनते
वो सब के सब परीशाँ हैं वहाँ पर क्या हुआ होगा

तुम्हारे शहर में ये शोर सुन-सुन कर तो लगता है
कि इंसानों के जंगल में कोई हाँका हुआ होगा

कई फ़ाक़े बिता कर मर गया जो उसके बारे में
वो सब कहते हैं अब, ऐसा नहीं,ऐसा हुआ होगा

यहाँ तो सिर्फ़ गूँगे और बहरे लोग बसते हैं
ख़ुदा जाने वहाँ पर किस तरह जलसा हुआ होगा

चलो, अब यादगारों की अँधेरी कोठरी खोलें
कम-अज-कम एक वो चेहरा तो पहचाना हुआ होगा
इस नदी की धार से ठंडी हवा आती तो है
नाव जर्जर ही सही, लहरों से टकराती तो है

एक चिंगारी कहीं से ढूँढ लाओ दोस्तो
इस दिये में तेल से भीगी हुई बाती तो है

एक खँडहर के हृदय-सी,एक जंगली फूल-सी
आदमी की पीर गूँगी ही सही, गाती तो है

एक चादर साँझ ने सारे नगर पर डाल दी
यह अँधेरे की सड़क उस भोर तक जाती तो है

निर्वसन मैदान में लेटी हुई है जो नदी
पत्थरों से ओट में जा-जा के बतियाती तो है

दुख नहीं कोई कि अब उपलब्धियों के नाम पर
और कुछ हो या न हो, आकाश-सी छाती तो है
हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए,
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।

आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी,
शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए।

हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में,
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए।

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।
हम भी जलाते थे आँधियों में चिराग ;
आज हम जमाने की हवा देख रहे हैं...
मैंने तो यूँ फेरी थी रेत में उंगलियां ;
देखा तो गौर से तेरी तस्वीर बन गयी.
कौन किसी का साथ देता है जहां में ए दोस्त ;
आखिरी वक्त तो निगाहें भी पलट जाती है .
कौन किसी का साथ देता है जहां में ए दोस्त ;
आखिरी वक्त तो निगाहें भी पलट जाती है .
कौन देता है ज़िन्दगी भर का साथ,
लोग ज़नाजे में भी कांधे बदलते रहते हैं
तुमने कहा था आँख भर के देख लिया करो मुझे,
अब आँख भर आती है पर तुम नजर नहीं आते..
कल हलकी सी बरसात में हो गयी मुलाकात उनसे,
नज़रों की शबनम ने जैसे कर ली हो हर बात उनसे..

उनकी आँखों में थी ऐसी कशिश के क्या कहें,
मेरे जिस्म के रोम रोम ने कर ली मोहब्बत उनसे..

मासूम है इस क़दर उनकी छुअन का एहसास,
आखिर एक मोड़ पर कर ली मेरी हया ने हरारत उनसे..

पलकों के परदे में करवट लेती थी कुछ पाक खताएं,
मेरी मुस्कराहट ने कर ही ली हो जैसे शरारत उनसे..

गाने लगी उनकी ख़ामोशी कुछ ऐसे हसीं नगमें,
संभाले न जाते थे शायद अपने ख्यालात उनसे...

बूंदों में बरस रहा हो जैसे प्यार बेशुमार,
कुछ खामोश से सवालों के मिल गए हो जवाबात उनसे....
तेरे एहसासों में हमें हर एक पल मुस्कुराना अच्छा लगा,
फिर उन्हीं मुस्कुराहटों से पलकें भिगोना अच्छा लगा..

एक तेरा मुझे अपनी आगोश में समेटना मुझे मेरा हर ख्वाब सच्चा लगा,
हकीकत से वाकिफ थे हम फिर भी नामुमकिन से ख्वाब बनना अच्छा लगा...

हर शब्, शेहेर, हर दुआ में, हर सजदे में माँगा तुझे,
न जाने क्यों तेरा हर एक लम्हे पे इख्तियार हमें अच्छा लगा..

रूह तड़पती रही मेरी हर वक़्त तेरे पास आने की ख्वाहिश में,
तेरी मासूम मोहब्बत की तपिश में जलना फिर भी अच्छा लगा.....
दिन का उजाला है, पर रात अभी बाकी है,
उनके इज़हार-ए-मोहब्बत की बात अभी बाकी है,
वो होंटों पे मेरे उनकी उँगलियों का आना,
और इज़हार करते करते उनका यूँ रुक जाना,
वो जिस्म में मेरे उनकी रूह अभी बाकी है,
इंतज़ार की हद क्या होगी पूरी ज़िन्दगी अभी बाकी है......
ये ज़िन्दगी ये अदा, ये सादगी, ये हया,
उन्हीं पे सजती हैं ये दिल-रुबानियाँ..

वो ज़ुल्फ़ महकी हुई, सादे से एक चेहरे पर,
मेरी रूह में उतरी है सब निशानियाँ..

न गिला है तुमसे कोई, न शिकायत है तुमसे कोई,
मेरा तो तुम से एक रिश्ता-ए-जान सब से सिवा है..
हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए,
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।

आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी,
शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए।

हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में,
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए।

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।




शास्वत जी,

दुष्यंत जी की इतनी सुन्दर कवितायें पेश करने के लिए धन्यवाद.

ये वाली कविता सबसे अच्छी लगी.

और सबसे अच्छी पंक्तियाँ....

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।

अगर आपके या किसी और सदस्य के पास मुन्नवर राणा जी की रचनाएं हो तो उसे इस सूत्र में पोस्ट करें....
तुमने कहा था आँख भर के देख लिया करो मुझे,
अब आँख भर आती है पर तुम नजर नहीं आते..


रिहान जी,

बहुत ही खूबसूरती से बात कही गयी है इस शेर में....

आपके द्वारा पेश किये गए सारे शेर बहुत ही उम्दा हैं....
तुमने कहा था आँख भर के देख लिया करो मुझे,
अब आँख भर आती है पर तुम नजर नहीं आते..


तुमको गैरों से कब फुर्सत ,

हम अपने गम से कब खाली .

चलो बस हो चुका मिलना...

ना तुम खाली , ना हम खाली.....
मुझ से बड़ा बदनसीब कोई इस जहां में नही
उम्र गुजरी है मेरी गम-ए- हबीब के साथ /
इतना गरूर है गर मुर्दों को नींद पे अपनी
तो सो ले शर्त लगाकर मेरे नसीब के साथ.//
किस्मत में जो सख्ती थी वह मर कर भी नही निकली;
कब्र खोदी गयी मेरी तो पथरीली जमीन निकली.
शास्वत जी,

दुष्यंत जी की इतनी सुन्दर कवितायें पेश करने के लिए धन्यवाद.

ये वाली कविता सबसे अच्छी लगी.

और सबसे अच्छी पंक्तियाँ....

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।

अगर आपके या किसी और सदस्य के पास मुन्नवर राणा जी की रचनाएं हो तो उसे इस सूत्र में पोस्ट करें....


माँ पर तो उन्होंने जो लिख दिया है वो इतिहास हो गया और उनसे बेहतर कोई और लिख ही नहीं पाया सुनिए-

किसी को घर मिला हिस्से में, या कोई दुकां आई
मैं घर में सबसे छोटा था, मेरे हिस्से में माँ आई॥

ऐ अँधेरे देख मुह तेरा काला हो गया
माँ ने आँखें खोल दी, घर में उजाला हो गया॥

लबों पे उसके कभी बद्दुआ नहीं होती
एक मेरी माँ है जो मुझसे खफा नहीं होती॥
मेरी अनाह(अहंकार) का कद ज़रा ऊँचा निकल गया
जो भी लिबास पहना वो छोटा निकल गया
वो सुबह सुबह आये मेरा हाल पूछने
कल रात वाला खाब तो सच्चा निकल गया
वो डबडबाई आँखों से आये हैं देखने
इस बार तो करेला भी मीठा निकल गया
शायद वफ़ा नहीं है हमारे नसीब में
इस ओधनी का रंग भी कच्चा निकल गया
दुनिया सलूक करती है हलवाई की तरह
तुम भी उतारे जाओगे मलाई की तरह
माँ बाप मुफलिसों की तरह देखते हैं बस
कद बेटियों के बढ़ते हैं महंगाई की तरह
हम चाहते हैं रक्खे हमें भी ज़माना याद
ग़ालिब के शेर तुलसी की चौपाई की तरह
हमसे हमारी पिछली कहानी न पूछिए
हम खुद उधड़ने लगते हैं तुरपाई की तरह॥
उनके हाथों से मेरे हक में दुआ निकली है
जब मर्ज़ फ़ैल गया है तो दावा निकली है
एक ही झटके में वो हो गयी टुकड़े टुकड़े
कितनी कमज़ोर वफ़ा की ज़ंजीर निकली है॥
मिटटी में मिला दे की जुदा हो नहीं सकता
अब इससे जियादा मैं तेरा हो नहीं सकता
किसी शक्स ने रख दी हैं तेरे दर पे आँखें
इससे रोशन तो कोई और दिया हो नहीं सकता॥
कहने की ये बात नहीं है लेकिन कहना पड़ता है
एक तुझसे मिलने की खातिर सबसे मिलना पड़ता है
माँ बाप की बूढी आँखों में एक फिक्र सी छाई रहती है
जिस कम्बल में सब सोते थे अब वह भी छोटा पड़ता है॥
माँ पर तो उन्होंने जो लिख दिया है वो इतिहास हो गया और उनसे बेहतर कोई और लिख ही नहीं पाया सुनिए-

किसी को घर मिला हिस्से में, या कोई दुकां आई
मैं घर में सबसे छोटा था, मेरे हिस्से में माँ आई॥

ऐ अँधेरे देख मुह तेरा काला हो गया
माँ ने आँखें खोल दी, घर में उजाला हो गया॥

लबों पे उसके कभी बद्दुआ नहीं होती
एक मेरी माँ है जो मुझसे खफा नहीं होती॥



शास्वत जी,

आपकी इन सुदर प्रस्तुति के लिए 'वाह" ही कह सकता हूँ क्योंकि इतनी जल्दी आपको दोबारा reputation दे नहीं सकता.

कृपया मुन्नवर जी की माँ पर ही लिखी और रचनाएं पेश करें.

जो आप ने प्रस्तुत की हैं,वो तो मेरे पास हैं और काफी तो मैं इस सूत्र में पोस्ट कर चुका हूँ.
रिहान जी,

बहुत ही खूबसूरती से बात कही गयी है इस शेर में....

आपके द्वारा पेश किये गए सारे शेर बहुत ही उम्दा हैं....



तुमको गैरों से कब फुर्सत ,

हम अपने गम से कब खाली .

चलो बस हो चुका मिलना...

ना तुम खाली , ना हम खाली.....

जी शुक्रिया,
वो तो मिलता है मुझसे महदूद से लम्हों में "फ़रज"
ये दिल है कितनी फुर्सत से सोचता है उसे...
किस्मत में जो सख्ती थी वह मर कर भी नही निकली;
कब्र खोदी गयी मेरी तो पथरीली जमीन निकली.

बहुत खूब अनु जी,
रेपुटेशन कबूल करें
हर एक पाऊँ मुझे रौंदते हुए गुजरे,
ना जाने कौन सी मंजिल का रास्ता हूँ मैं..
माँ पर तो उन्होंने जो लिख दिया है वो इतिहास हो गया और उनसे बेहतर कोई और लिख ही नहीं पाया सुनिए-

किसी को घर मिला हिस्से में, या कोई दुकां आई
मैं घर में सबसे छोटा था, मेरे हिस्से में माँ आई॥

ऐ अँधेरे देख मुह तेरा काला हो गया
माँ ने आँखें खोल दी, घर में उजाला हो गया॥

लबों पे उसके कभी बद्दुआ नहीं होती
एक मेरी माँ है जो मुझसे खफा नहीं होती॥
बेहतरीन शायरी है दोस्त,
रेपुटेशन कबूल करें
अगर वो पूछ लें हमसे कहो किस बात का ग़म है,
तो फिर किस बात का ग़म है, अगर वो पूछ लें हमसे...
ये सुबह का मंज़र भी क़यामत का हसीन है,
तकिया है कहीं, ज़ुल्फ़ कहीं, खुद वो कहीं हैं...

तुम्हारा दिल मेरे दिल के बराबर हो नहीं सकता
वह शीशा हो नहीं सकता यह पत्थर हो नहीं सकता
अपनी मर्ज़ी से कहाँ अपने सफ़र के हम हैं
रुख़ हवाओं का जिधर का है उधर के हम हैं
बेसबब इश्क़ में मरना मुझे मंज़ूर नहीं
शमा तो चाह रही है कि पतंगा हो जाऊँ

शायरी कुछ भी हो रुसवा नहीं होने देती
मैं सियासत में चला जाऊं तो नंगा हो जाऊँ
जिंदगी उनकी चाह में गुजरी
मुस्तकिल दर्दो आह में गुजरी

रहमतों से निबाह में गुजरी
उम्र सारी गुनाह में गुजरी
लुत्फ़ वो इश्क़ में पाये हैं कि जी जानता है
रंज भी इतने उठाये हैं की जी जानता है
रात दिन नामा-ओ -पैगाम कहाँ तक होगा,
साफ कह दीजीय मिलना हमे मंजूर नही !
गजब किया तेरे वादे पे एतबार किया ,
तमाम रात कयामत का इंतजार किया !
लूटेंगी वो निगाहें हर कारवां दिल का ,
जब तक चलेगा रस्ता ये रहजनी रहेगी !
कुछ जहर न थी शराबे अंगूर ,
क्या चीज हराम हो गई है !
कुछ जहर न थी शराबे अंगूर ,
क्या चीज हराम हो गई है !
अच्छी सूरत पे ग़ज़ब टूट के आना दिल का
याद आता है हमें हाय! ज़माना दिल का
दरवाज़ों के शीशे न बदलवाइए नज़मी
लोगों ने अभी हाथ से पत्थर नहीं फेंके
धर्म

तेज़ी से एक दर्द
मन में जागा
मैंने पी लिया,
छोटी सी एक ख़ुशी
अधरों में आई
मैंने उसको फैला दिया,
मुझको सन्तोष हुआ
और लगा –-
हर छोटे को
बड़ा करना धर्म है ।
यह क्यों ?

हर उभरी नस मलने का अभ्यास
रुक रुककर चलने का अभ्यास
छाया में थमने की आदत
यह क्यों ?

जब देखो दिल में एक जलन
उल्टे उल्टे से चाल-चलन
सिर से पाँवों तक क्षत-विक्षत
यह क्यों ?

जीवन के दर्शन पर दिन-रात
पण्डित विद्वानों जैसी बात
लेकिन मूर्खों जैसी हरकत
यह क्यों ?
यह मेरे आंसू जिन्हें कोई पूछने वाला भी नहीं,
कोई आँचल इन्हें मिलता तो सितारे होते..........

NOTE:यह शेर मेरा अपना नहीं है....
दिल ना उम्मीद तो नहीं....नाकाम ही तो है
लम्बी है गम की शाम मगर शाम ही तो है.....
NOTE :यह शेर मेरा अपना नहीं है....
एक दिया जो सब को राह दिखने निकले
आंधियां बन कर कई लोग बुझाने निकले....

नोट:यह शेर भी मेरा नहीं है..
यह मेरे आंसू जिन्हें कोई पूछने वाला भी नहीं,
कोई आँचल इन्हें मिलता तो सितारे होते..........

NOTE:यह शेर मेरा अपना नहीं है....


दिल ना उम्मीद तो नहीं....नाकाम ही तो है
लम्बी है गम की शाम मगर शाम ही तो है.....
NOTE :यह शेर मेरा अपना नहीं है....


एक दिया जो सब को राह दिखने निकले
आंधियां बन कर कई लोग बुझाने निकले....

नोट:यह शेर भी मेरा नहीं है..


विक्की जी ,

यहाँ पर वोही शेर पेश हो रहे हैं,

जो की हमारे नहीं अपितु किसी महान शायर के हैं.

इसलिए आप यहाँ ऐसे ही खूबसूरत शेर पोस्ट करते रहिये.
तमाम उम्र तेरा इंतज़ार कर लेंगे,
मगर ये रंज रहेगा के ज़िन्दगी कम है
ज़रा सी बात है लेकिन ज़माने तू नहीं समझा,
मोहब्बत जिस्म का रिश्ता नहीं रूहों का रिश्ता है
सफ़र-ए-इश्क पर चले हो, बहुत उमंगों के साथ
राह में दुशवारियाँ भी आएँगी हिम्मत न हारना
जो चल सको तो कोई ऐसी चाल चल जाना
मुझे गुमाँ भी ना हो और तुम बदल जाना
ए खुदा अब तेरी फिरदौस पे मेरा हक है,
तूने इस दौर की दो जख में जलाया है मुझे

फिरदौस = जन्नत
उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो,
न जाने किस गली में ज़िन्दगी की शाम हो जाये।
बशीर बद्र
दुनिया जिसे कहते हैं जादू का खिलौना है
मिल जाये तो मिट्टी है खो जाये तो सोना है

ग़म हो कि ख़ुशी दोनों कुछ देर के साथी हैं
फिर रस्ता ही रस्ता है हँसना है न रोना है

ये वक्त जो तेरा है, ये वक्त जो मेरा
हर गाम पर पहरा है, फिर भी इसे खोना है

जो चल सको तो कोई ऐसी चाल चल जाना
मुझे गुमाँ भी ना हो और तुम बदल जाना


ए खुदा अब तेरी फिरदौस पे मेरा हक है,
तूने इस दौर की दो जख में जलाया है मुझे

फिरदौस = जन्नत


रिहान जी और शास्वत जी आप दोनों के बारे में सिर्फ ३ शब्द.....

:bloom:"SIMPLY THE BEST ":bloom:
रिहान जी और शास्वत जी आप दोनों के बारे में सिर्फ ३ शब्द.....

:bloom:"SIMPLY THE BEST ":bloom:
शुक्रिया मित्र......!
तलाश कर मेरी मोहब्बत को अपने दिल में,
दर्द हो तो समझ लेना के मोहब्बत अब भी बाक़ी है...
उस शख्स को तो बिछड़ने का सलीका नहीं "फ़रज़"
जाते हुए खुद को मेरे पास छोड़ गया...!
तुम्हीं ने हमको सुनाया ना अपना दुःख वरना
दुआ वो करते के आसमाँ हिला देते
तेरी हस्ती से तेरी ज़ात से खुशबू आये
तू जो बोले तो तेरी बात से खुशबू आये
तुझको देखूं तो मेरी आँख महक सी जाये
तुझको सोचूं तो ख्यालात से खुशबू आये
तू चमेली है, नर्गिस है, या रात की रानी
तुझको छु लूँ तो मेरे हाथ से खुशबु आये
अच्छी सूरत भी क्या बुरी शै है
जिस ने डाली बुरी नजर डाली
कहाँ तक आँख रोएगी कहाँ तक किसका ग़म होगा
मेरे जैसा यहाँ कोई न कोई रोज़ कम होगा

तुझे पाने की कोशिश में कुछ इतना रो चुका हूँ मैं
कि तू मिल भी अगर जाये तो अब मिलने का ग़म होगा

समन्दर की ग़लतफ़हमी से कोई पूछ तो लेता ,
ज़मीं का हौसला क्या ऐसे तूफ़ानों से कम होगा

मोहब्बत नापने का कोई पैमाना नहीं होता ,
कहीं तू बढ़ भी सकता है, कहीं तू मुझ से कम होगा
मेरी बर्बादी ही तेरी खुशियाँ हैं गर ...
तो जी भर के खुशियाँ तुम मनाती रहो.
मैं उफ़ तक न करुगा खुदा की कसम
चाहे मेरे खून से मेहंदी तुम रचाती रहो.
जख्म एक नही दो नही तमाम जिस्म जख्मी है,
दर्द खुद परेशान है कि मैं ककहां से उठूँ ................
बर्बाद गुलिस्तां करने को इक उल्लू काफी होता है,
हर शाख पे उल्लू बैठा है अंजाम-ए - गुलिस्तां क्या होगा .
चमन अच्छा नही लगता कली देखि नही जाती
गुलों के दरमियाँ कमी तेरी देखि नही जाती,
ए परवर दिगार मुझको उसके हिस्से के भी गम अता कर दे
उन मासूम आँखों में नमी देखि नही जाती .
शकील बदायूनी



कैसे कह दूँ कि मुलाकात नहीं होती है
रोज़ मिलते हैं मगर बात नहीं होती है
शकील बदायूनी

आप लिल्लाह न देखा करें आईना कभी
दिल का आ जाना बड़ी बात नहीं होती है
शकील बदायूनी


छुप के रोता हूँ तेरी याद में दुनिया भर से
कब मेरी आँख से बरसात नहीं होती है
शकील बदायूनी


हाल-ए-दिल पूछने वाले तेरी दुनिया में कभी
दिन तो होता है मगर रात नहीं होती है
शकील बदायूनी


जब भी मिलते हैं तो कहते हैं कैसे हो "शकील"
इस से आगे तो कोई बात नहीं होती है
हरेक चहरे को ज़ख़्मों का आइना न कहो
ये ज़िंदगी तो है रहमत इसे सज़ा न कहो
न जाने कौन सी मजबूरियों का क़ैदी हो
वो साथ छोड़ गया है तो बेवफ़ा न कहो
तमाम शहर ने नेज़ों पे क्यों उछाला मुझे
ये इत्तेफ़ाक़ था तुम इसको हादिसा न कहो
ये और बात के दुशमन हुआ है आज मगर
वो मेरा दोस्त था कल तक उसे बुरा न कहो
हमारे ऐब हमें ऊँगलियों पे गिनवाओ
हमारी पीठ के पीछे हमें बुरान कहो
मैं वाक़यात कीज़ंजीर का नहींकायल
मुझे भी अपने गुनाहो का सिलसिला न कहो
ये शहर वो है जहाँ राक्षस भीहैं राहत
हर इक तराशे हुए बुत को देवता न कहो
आज आगोश में था कोई और.....

देर तक हम तुझे ना भूल सके.....
एक आध कांटा और है पैरों में मियां ,

अब क्या है , अब तो सारा बुढापा निकल गया....
मेरी रफ़्तार पर कितना सितम ढाते हैं चौराहे ,

मैं जब भी तेज़ चलता हूँ ,तो आ जाते हैं चौराहे.....
सुलगते लम्स की खुशबू हवा में छोड़ गया ,

वो जो हमसफ़र था , सफ़र में छोड़ गया .....:tuta-dil:
इशरते-कतरा है ,दरिया में फ़ना हो जाना ,

दर्द का हद से गुजरना है ,दवा हो जाना.....
एक आध कांटा और है पैरों में मियां ,

अब क्या है , अब तो सारा बुढापा निकल गया....
अगर ख़िलाफ़ हैं होने दो जान थोड़ी है
ये सब धुआँ है कोई आसमान थोड़ी है
लगेगी आग तो आएँगे घर कई ज़द में
यहाँ पे सिर्फ़हमारा मकान थोड़ी है
मैं जानता हूँ के दुश्मन भी कम नहीं लेकिन
हमारी तरहा हथेली पे जान थोड़ी है
हमारे मुँह से जो निकले वही सदाक़त है
हमारे मुँह मेंतुम्हारी ज़ुबान थोड़ी है
जो आज साहिबे मसनद हैं कल नहीं होंगे
किराएदार हैं ज़ाती मकान थोड़ी है
सभी का ख़ून है शामिल यहाँ की मिट्टी में
किसी के बाप का हिन्दोस्तान थोड़ी है
तुझे ऐ ज़िंदगी, हम दूर से यह भान लेते हैं
मेरी हर ग़ज़ल की ये आरज़ू, तुझे सज-सजा के निकालिए,
मेरी फ़िक्र हो तेरा आइना, मेरे नग्में हों तेरे पैरहनन1।
जब से देखा है तुझे मुझसे है मेरी अनबन.
हुस्न का रंगे-सियासत, मुझे मालूम न था।
इसको भी इक दिल का भरम जानिए,
हुस्न कहाँ, इश्क़ कहाँ, हम कहाँ।
कहाँ से आ गयी दुनिया कहाँ, मगर देखो,
कहाँ-कहाँ से अभी कारवाँ गुज़रता है।
इश्क़ के कुछ लम्हों की क़ीमत उजले-उजले आँसू हैं,
हुस्न से जो कुछ भी पाया था कौड़ी-कौड़ी अदा किया।
मन्दिर भी था उसका पता, मस्जिद भी थी उसकी ख़बर
भटके इधर, अटके उधर, खोला नहीं अपना ही घर.

मेला लगा था हर जगह बनता रहा वो मसअला
कुछ ने कहा वो है इधर, कुछ ने कहा वो है उधर.

वो रूप था या रंग था हर पल जो मेरे संग था
मैंने कहा तू कौन है....उसने कहा तेरी नज़र.

कल रात कुछ ऐसा हुआ अब क्या कहें कैसा हुआ
मेरा बदन बिस्तर पे था, मैं चल रहा था चाँद पर.
मन्दिर भी था उसका पता, मस्जिद भी थी उसकी ख़बर
भटके इधर, अटके उधर, खोला नहीं अपना ही घर.

मेला लगा था हर जगह बनता रहा वो मसअला
कुछ ने कहा वो है इधर, कुछ ने कहा वो है उधर.

वो रूप था या रंग था हर पल जो मेरे संग था
मैंने कहा तू कौन है....उसने कहा तेरी नज़र.

कल रात कुछ ऐसा हुआ अब क्या कहें कैसा हुआ
मेरा बदन बिस्तर पे था, मैं चल रहा था चाँद पर.
रेख्ते के तुम हीं उस्ताद नहीं हो ’ग़ालिब’
कहते हैं अगले जमाने में कोई मीर भी था

कोई मेरे दिल से पूछे तेरे तीर-ए-नीमकश को
ये ख़लिश कहाँ से होती जो जिगर के पार होता
कहाँ से आ गयी दुनिया कहाँ, मगर देखो,
कहाँ-कहाँ से अभी कारवाँ गुज़रता है।
क्या पता था दोस्त ऐसे भी दगा दे जायेगा,

अपने दुश्मन को मेरे घर का पता दे जाएगा.
जो जा के ना आये वो बचपन देखा.

वो आ के ना जाए , वो बुढ़ापा देखा.....

मुश्किलों से जो डरते हैं,ज़लीले खार होते हैं,

बदल दे वक़्त कि तकदीर,वो खुद्दार होते हैं.

हजारों डूबते हैं,नाखुदाओं के भरोसे पर,

जो खुद चप्पू चलते हैं,वो अक्सर पार होते हैं.....
लहरों से डरकर नौका पार नहीं होती ,

मेहनत करने वालों कि कभी हार नहीं होती.....
ताब-ए-गम-ए-दिल कहाँअंगारों में शरारों में

ढूँढते रहे उन्हें हमलकीरों में सितारों में
बदगुमां हो के मिल ए दोस्त जो मिलना है तुझे
ये झिझकते हुए मिलना कोई मिलना भी नहीं
मुझे बेदर्द कहते है,मेरे दिल को पत्थर कहते है!
पर पत्थरो पर लिखे ही तो सदियों तक रहते है!
शमा से लिपट जाता है,परवाना राख हो जाता है!
जो इश्क के चक्कर मे पड़ता है वो खाक हो जाता है!
बुढ़ापा आने के बाद ही जवानी रंग लाती है!
पत्तो के सूख जाने के बाद ही उनमे आवाज़ आती है!
प्यार मे जीने की बात करने से ही सनम मिलता है!
जो मरने की बात करते है उन्हे बस कफ़न मिलता है!
खुद को खुदा समझते है,दौलत के सिंघासन पर हो के आसीन!
ये नही जानते की मरने के बाद मिलती है, बस दो गज़ ज़मीन!
‘‘आँख जो कुछ देखती है, लब पै आ सकता नहीं।
महवे-हैरत हूँ कि दुनिया क्या से क्या हो जायेगी।
सजदे करूँ, सवाल करूँ, इल्तजा करूँ।
यूँ दे तो कायनात मेरे काम की नहीं।।
वो ख़ुद अता करे तो जहन्नुम भी है बहिश्त।
माँगी हुई निजात मेरे काम की नहीं।।
मुझको कहने दो कि मैं आज भी जी सकता हूँ।
इश्क़ नाकाम सही, ज़िन्दगी नाकाम नहीं।।
दरिया की ज़िन्दगी पर, सदक़े हज़ार जानें।
मुझको नहीं गवारा, साहिल की मौत मरना।।
‘‘दास्ताँ उनकी अदाओं की है रंगीं, लेकिन।
उसमें कुछ खूनेतमन्ना भी है शामिल अपना।।’’
‘ये बज़्मे मय है, याँ कोताह दस्ती में है महरूमी।
जो बढ़कर खुद उठा ले हाथ में, मीना उसी का है।।’’
‘‘ऊँचे-ऊँचे मुजरिमों की पूछ होगी हश्र में।
कौन पूछेगा मुझे मैं किन गुनहगारों में हूँ।।’’
इस शान से वह आज पए-इम्तहाँ चले
कितनो ने पाँव चूम के पूछा कहाँ चले
जब मैं चलूँ तो साया भी मेरा न साथ दे
जब वह चलें, ज़मीन चले, आसमाँ चले.
न किसी की आँख का नूर हूँ, न किसी के दिल का क़रार हूँ
जो किसी के काम न आ सके, मैं वो एक मुश्ते ग़ुबार हूँ.
" हिज्र की बात हुई तो मुझे तेरी याद आई ,

मैं कब्र में जा बैठा तो तुझे मेरी याद आई !! "
" जब उनका चेहरा आया जुल्फों से निकलकर,

मेरे बेकरार दिल को करार आ गया !! "
जिन चराग़ों से बुर्ज़ुगों ने रौशनी की थी
उन्हीं चराग़ों से हम बस्तियाँ जलाते हैं।
गाँव से शहर में आए तो ये मालूम हुआ
घर नहीं दिल भी यहाँ पत्थरों के होते हैं।
कोशिश तो की बहुत मगर दिल तक नहीं पहुँचे
वो शहर के थे हाथ मिलाकर चले गए।
किसके दिल में है क्या अंदाज़ा नहीं मिलता है
शहर-ए-दीवार का दरवाज़ा नहीं मिलता है।
फूलों की न उम्मीद करो आके शहर में
घर में यहाँ तुलसी की जगह नागफनी है।
बहुत आसाँ है रो देना, बहुत मुश्किल हँसाना है
कोई बिन बात हँस दे-लोग कहते हैं "दिवाना है"
आज के हालात का मैं तब्सरा हूँ
ख़ुश-तबस्सुम-लब मगर अन्दर डरा हूँ
सब लोग ज़माने में सितमगर नहीं होते
क़द एक हो तो लोग बराबर नहीं होते

क़ुदरत के इल्तिफ़ात से है शायरी का फ़न
सब शे'र कहने वाले भी शायर नहीं होते
तरसेगा जब दिल तुम्हारा मेरी मुलाकात को।
ख़्वाबों में होंगे तुम्हारे हम उसी रात को।।

कहकर भी नहीं कहते वो सिर्फ डर के मारे।
सुनकर भी नहीं सुनते हम सिर्फ डर के मारे।।
प्यार करना प्यार पाना दोनों हैं बातें ज़ुदा।
कश्ती को हरदम किनारा कहाँ देता है खुदा।।
हम तो समझे थे कि अकेले हैं, अपना कोई हमारे पास नहीं।
तेरी ज़ानिब जो ये नज़र फेरी, करार मेरे दिल को तब आया।।
ख़्याल जब तुम्हारा आता है, दिल को मेरे यक़ीन होता है।
मेरे होने का कोई मतलब है, मेरी भी जग में कोई हस्ती है।।
खुदी को कर बुलंद इतना कि, हर तदबीर से पहले
खुदा बन्दे से खुद पूछे, “बता तेरी रज़ा क्या है?
मुझको कहने दो कि मैं आज भी जी सकता हूँ।
इश्क़ नाकाम सही, ज़िन्दगी नाकाम नहीं।।
बुलन्दी देर तक किस शख़्स के हिस्से में रहती है
बहुत ऊँची इमारत हर घड़ी ख़तरे में रहती है
बहुत जी चाहता है क़ैद-ए-जहाँ से हम निकल जाएँ
तुम्हारी याद भी लेकिन इसी मलबे में रहती है
Ek tere roth jane se ae dost
Saari dunya khafa si lagti hai
मियाँ मैं शेर हूँ शेरों की गुर्राहट नहीं जाती
मैं लहजा नर्म भी कर लूँ तो झुँझलाहट नहीं जाती
मैं इक दिन बेख़याली में कहीं सच बोल बैठा था
मैं कोशिश कर चुका हूँ मुँह की कड़ुवाहट नहीं जाती
जहाँ मैं हूँ वहीं आवाज़ देना जुर्म ठहरा है
जहाँ वो है वहाँ तक पाँव की आहट नहीं जाती
मोहब्बत का ये जज्बा जब ख़ुदा कि देन है भाई
तो मेरे रास्ते से क्यों ये दुनिया हट नहीं जाती
वो मुझसे बेतकल्लुफ़ हो के मिलता है मगर
न जाने क्यों मेरे चेहरे से घबराहट नहीं जाती.
बात कम कीजिये, जहालत छुपाते रहिये.

अजनबी दुनिया है,दोस्त बनाते रहिये.

दिल मिले न मिले,हाथ मिलाते रहिये.
हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है?
तुम ही कहो कि ये अंदाजे गुफ़्त्गू क्या है?
रगों में दौड़ते फ़िरने के हम नहीं कायल...
जब आ~म्ख हीं से न टपका तो फ़िर वो लहू क्या है?

मिर्जा गालिब
रोके जो मेरी राह ,वो मंजर नहीं आया.

अभी तक मेरी राह में समंदर नहीं आया ....
तन्हाइयों में साथ निभायेंगे एक दिन.....

अश्कों को अपने साथ लिए जा रहा हूँ...
पलकों को अब झपकने की आदत नहीं रही,

जाने क्या हुआ है, तुझे देखने के बाद....
ज़िन्दगी में तुझे जो गम मिलेंगे,

मेरे हौसले से कम मिलेंगे.

जब भी हसरत करोगी मेरी,

तेरे सामने तुझे हम मिलेंगे...
जहाँ से आये हो वहीँ पर जाना है
समझ सके तो समझ लो वरना खाली ही लौटना है!!!
दिल के करके टुकड़े हजार इस कदर चल दिए
आंसू भी गिर ना सके तेरे जाने के बाद!!!
जानू जानू करता था,जाने के तेरे गम न हुआ
आज तू नहीं तो क्या,दुःख का पहाड़ कोई कम न हुआ.....
बिना तेरे जी न सका..मरने की बात ही दूर है
नासमझ को क्या समझाना जो दिल ही मजबूर है!!!
सौ बार ख़त निकलकर देखा है जेब से,

हम जो समझ रहे हैं,वो उसने लिखा नहीं....
बिना तेरे जी न सका..मरने की बात ही दूर है
नासमझ को क्या समझाना जो दिल ही मजबूर है!!!
कल आया था खत उनका, उनको बिस्तर से उठने कि हिम्मत न थी;
आज वो दुनिया को छोड़ कर चल दिए, इतनी ताकत कहाँ से आ गयी.
कौन किसी का साथ देता है जहां में ए दोस्त,
आखिरी वक्त तो पलके भी पलट जाती हैं.
तुझे पाना जिंदगी है, तुझे खोना मौत है मेरी ;
कुछ और इसके सिवा मेरे फसाने में नही,
मांग लूंगा खुदा से या चुरा लूगा तुझे;
तुझसा दूसरा मोती उसके खजाने में नही..
कहीं चल पड़ा यह मुसाफिर कुछ इस तरह
जब आये तब की पता नहीं मगर जाते हुए देखे पूरा जहाँ...
मित्र बनाओ तो ऐसे बनाओ के जिंदगी भर साथ दे
प्यार के पीछे क्या जाना जो कल को मिट जाये...

आई क्लास की याद तो आसू निकल गए
दिल के करीब आके जो हामसे बिछड़ गए
एक मोड पे मिले थे हम सारे अजनबी
पता भी न लगा कब रास्ते बिखर गए
काश मेरे प्यार का अंत कुछ ईस कदर हो
की मेरे कबर पर बना उनका घर हो
वो जब जब सोये जमीन पर
मेरे सिने से लगा उनका सिर हो

रंज की जब गुफ्तगू होने लगी
आप से तुम, तुम से तू होने लगी
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