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नदी, ख्वाहिशें और कुछ ख़्वाब अधूरे से...

रात लड़के ने होटल में नहीं बल्कि एक ट्रेन के कूपे में बिताया था. ये भी एक मजेदार किस्सा था. एक दिन पहले जब सुबह लड़का हावड़ा स्टेशन पहुंचा, ट्रेन से उतरते ही उसे एक परिचित मिल गए. वो उसके दूर के चाचा थे जो रेलवे में कार्यरत  थे. अकसर रेलवे में काम करने वाले कर्मचारी स्टेशन से दूर जो वार्ड में ट्रेनें खड़ी रहती हैं, उसके खाली कम्पार्टमेंट में अपना घर बना लेते हैं. उन्होंने लड़के से जिद की, कहाँ होटल में पैसे बर्बाद करोगे, तुम दो दिन मेरे साथ ही रहो, रात भर गप्पे मारेंगे. लड़के ने भी सोचा कि चलो होटल के पैसे बचेंगे और रात भी बातों में कट जायेगी, सो उनके साथ चला आया था.

 लड़के की रात थोड़ी बेचैनी में कटी थी. पूरी रात वो जागा रहा था. उसे इस बात की ख़ुशी थी कि वो होटल में ना रुक कर इस कूपे में रुका है, होटल में अकेले रहने से तो बेहतर है चाचा के साथ रुकना. इसी बहाने इतने अरसे के बाद मिले चाचा से कितनी सारी बातें हो गयी. उसके चाचा और उनके तीन चार और सहकर्मी जो वहां रुके थे, उन्होंने रात के खाने का इंतजाम भी कूपे में ही किया था. छोटा गैस चूल्हा से लेकर खाना बनाने के सारे इंतजाम उन लोगों ने कर रखे थे. देर रात तक बातें होती रही थी, और फिर सब सोने चले गए. लड़के की आँखों में लेकिन नींद कहीं न थी. वो दिन भर की बातों में खोया था. कूपे से उतर कर वो ट्रेन की  पटरियों के किनारे एक सीमेंट की  बेंच पर बैठ गया. बहुत सी बातें उसके मन में चल रही थी, कभी लड़की की  दिन भर की हरकतों को याद कर के उसको हँसी आती, कभी गिल्ट भी होता उसे कि ये एक ही तो मौका मिला था लड़की के साथ इस शहर को घूमने का, उसे एक और दिन यहाँ रुकना चाहिए था, अपने प्लान को एक्सटेंड कर लेना चाहिए था, तो कभी उसे थोड़ी बेचैनी होती.. दोनों में से किसी को ये नहीं पता था कि अब ऐसा लंबा साथ उन दोनों को कब मिलता है...मिलता भी है या नहीं? लड़का अपने जीवन के आगे की राह पर कदम बढाने वाला था, तो लडकी को भी उसकी किसी अनजानी मंजिल की तलाश में दूर जाना था. घर परिवार की कुछ बातें थी जिसके आगे लड़की बेबस थी. लड़का नहीं चाहता था कि लडकी एक सच्ची साथी बनने की चाह में एक बुरी बेटी बन जाए...इसलिए उसने एक बार भी उससे नहीं कहा...मत जाओ इतनी दूर...तुम्हारे बिना जीना भूल चुका हूँ मैं. रात भर लड़का बस यही दुआ माँगता रहा था, चाहे कुछ भी परिस्थितियां हों, हम दोनों कभी जुदा न हो. रात भर वो लड़की के बारे में और आने वाले दिनों के बारे में सोचता रहा. सुबह कब हुई ये लड़के को पता भी नहीं चल सका. 
उसके चाचा जब कूपे से बाहर आये तो उन्होंने देखा लड़का वहीँ सीमेंट की बेंच पर बैठा है. चाचा ने मजाक में सवाल भी किया, रात भर सोये नहीं क्या? लड़के ने बहाने से इस सवाल को टाल दिया. सुबह का नाश्ता  चाचा ने ही बनाया था, चाचा के बाकी के सभी साथी  सोये हुए ही थे. चाचा ने तो जिद की थी कि अगर कोई जरूरी काम नहीं हो तो वो उनके साथ उनके ऑफिस आ कर समय बिता सकता है, इसी बहाने थोड़ी और बातें हो जायेगी. लेकिन ये मुमकिन नहीं था. ट्रेन दोपहर बारह बजे की थी और लड़की ने पहले से कह रखा था कि वो दस बजे तक स्टेशन पहुँच जायेगी. लड़के ने बहाना बनाया कि उसके कुछ और साथी आने वाले हैं, वो चाचा से विदा लेकर सीधा हावड़ा स्टेशन के मुख्य द्वार पे आ गया जहाँ टैक्सियाँ लगती थी. लड़की ने वहीँ पर इंतजार करने कहा था उसे. 
हल्की  बारिश हो रही थी. मौसम सुबह से ही बड़ा खूबसूरत सा था. लड़के ने आसमान की तरफ देखकर एक बार फिर सोचा काश सच में कोई ऐसा चमत्कार हो जाए, एक दिन और दोनों को मिल जाए साथ रहने के लिए. लेकिन ये मुमकिन नहीं था. दो घंटे में ट्रेन खुलने वाली थी. ट्रेन पर भी दोनों साथ नहीं रह पायेंगे, लड़की का रिजर्वेशन एसी कम्पार्टमेंट में था और लड़के का सामान्य स्लीपर कूपे में. इस बात से भी लड़का थोड़ा उदास था. बार बार उसे एसी कम्पार्टमेंट में टिकट नहीं लेने का मलाल हो रहा था. 
लड़की ठीक समय पर स्टेशन पहुंची थी. स्टेशन के बाहर खड़ा वो लड़की को दूर से ही पहचान गया. वो टैक्सी में अपने दादा के साथ आई थी. दादाजी को देखकर लड़के का मन थोड़ा उतर गया. उसने सोचा था ट्रेन पर तो अलग अलग कम्पार्टमेंट में सीट हैं कम से कम स्टेशन पर तो दोनों को कुछ वक़्त साथ बिताने का मौका मिल जाए. 
दादाजी लेकिन टैक्सी से नीचे उतरे ही नहीं. लड़के से थोड़ी बात की और फिर उसी टैक्सी में जिसमे वो आये थे उससे ही वापस लौट गए. लड़का मन ही मन मुस्कुराने लगा, वो समझ गया था कि ये शरारत लड़की की ही है. उसने ही कहा होगा दादाजी से, आप बेवजह परेशान होंगे. मैं चली जाऊँगी . लड़के ने लड़की से पूछा.. “क्या बात है? दादाजी चले गए? ये साज़िश जरूर आपकी ही रही होगी?” लड़की हँसने लगी.. शरारती अंदाज़ में उसने कहा, “हाँ, जनाब, मैंने भेजा है दादू को वापस.. आपके साथ रहकर स्कीमें बनानीमुझे भी आ गया न अब. मैंने दादा से कहा कि मेरा ये नालायक दोस्त है न, उसका काम है मेरी हिफाज़त करना, करेगा मेरी हिफाज़त वो, आप निश्चिंत होकर जाइये. क्यों? ठीक कहा न मैंने?”लड़की उसे देखकर हँसने लगी. लड़का अकसर लड़की की ऐसी बातों पर चुप ही रहता है, थोड़ा झेंप सा गया वो. लड़की लेकिन पूरी बॉसगिरी दिखाते हुए कहने लगी, “चलो काम पर लग जाओ तुम..सामान उठाओ मेरा और चलो वेटिंग रूम की तरफ. 
आज शायद इन दोनों की सभी छोटी बड़ी दुआएं कबूल होने वाली थी और वो भी इतने आश्चर्यजनक तरीके से कि खुद इनको भी विश्वास नहीं हो पा रहा था. हावड़ा स्टेशन पर वेटिंग रूम प्लेटफोर्म की पहली मंजिल पर है. दोनों वेटिंग रूम जाने के लिए सीढियाँ चढ़ ही रहे थे कि अनाउंसमेंट  सुनाई दी.. For your kind attention please, Train number 12369 is running late by 6hrs and 30 minutes and will depart from howrah junction at 19:00 hrs. we’are sorry for the inconvenience. लड़की को तो पहले इस अनाउंसमेंट पर विश्वास ही नहीं हुआ, वो अनाउंसमेंट सुनते ही सीढ़ियों पर ही ख़ुशी से उछलने लगी. उछलने का मन तो वैसे लड़के का भी कर रहा था, लेकिन वो अपनी ख़ुशी को काबू में रखे हुए था, लड़की को जैसे तैसे खींचते तिरते वेटिंग रूम तक पहुँचा वो. लड़की को तो जैसे होश ही नहीं था. “कितना प्यारा लग रहा है न आज रेलवे का ये इरिटेटिंग सा अनाउंसमेंट. “Sorry for the inconvenience..” आज इस शब्द पर गुस्सा नहीं बल्कि प्यार आ रहा है, है न? लड़की ने लड़के की तरफ देखते हुए मुस्कुराते हुए कहा. 
लड़का भी उसकी  तरफ देखकर मुस्कुराने लगा. “हम दोनों यही चाहते थे न कि कुछ देर और साथ रहे, देखो हो गया न ये चमत्कार...” 
लड़की ने लड़के की बात को बीच में ही काट कर कहा – “तुम्हारा क्या हाथ है जी इसमें? इसे मैंने करवाया है..” वो फिर से अपने कुर्ते के कॉलर को गर्वीले अंदाज़ में हिलाती बोली.. “तुमसे तो मैंने कल ही कह दिया था न, Believe in Miracles. Miracles are waiting to be happen everywhere. देखा न आज तुमने इसका जीता जागता उदाहरण? अब अगर तुम कहो तो मैं तुम्हारे सामने ही इस लेट हुए ट्रेन को कैंसल ही करवा दूँ..बोलो? कैंसल करवाना है? रुकना है एक दिन और मेरे शहर में मेरे साथ? लड़के को लड़की की इन बातों पर हँसी भी आ रही थी और थोड़ी हैरत भी, ये सच में कैसा इत्तेफाक है?
ट्रेन छः घंटे देर से चलने वाली थी, ये अनाउंसमेंट जब से लड़की ने कानों में गयी थी, उसका मन बाहर घूमने का होने लगा था. 
“सुनो, एक जगह है यहाँ, बोई पारा..माने कॉलेज स्ट्रीट.. ज्यादा दूर नहीं है, टैक्सी से तुरंत पहुँच जायेंगे, बस हावड़ा ब्रिज क्रॉस  करो और थोड़ी देर में कॉलेज स्ट्रीट..मेरी सबसे पसंदीदा जगहों में से एक है, तुम्हें दिखाना चाहती हूँ, चलोगे घूमने वहां?” लड़का लेकिन थोडा दुविधाग्रस्त था, वो ये तय नहीं कर पा रहा था कि बाहर घूमने जाना सही होगा या नहीं. 
लड़के की इस दुविधा को लड़की ने भांप लिया था, “अरे साहब रेलवे स्टेशन के वेटिंग रूम में बैठ कर ट्रेन का इंतजार करने जैसा बोरिंग काम दूसरा नहीं, हाँ, अगर बारिश होती रहे, पूरे वेटिंग रूम में कोई न हो... डिट्टो इजाज़त जैसा कोई सीन हो तो फिर अलग बात है..चलो बाहर चलो..घूमो...भिगो बारिश में, फॉल इन लव विद माय सिटी....फॉल इन लव विद मी..” लड़का मुस्कुराने लगा, लेकिन फिर भी उसके मन में थोड़ी दुविधा थी. लड़की ने लड़के को तसल्ली देते हुए कहा, क्यों डर लग रहा है? खो जाने का डर है क्या मेरे शहर में? घबराओ नहीं तुम्हें तुम्हारे शहर सुरक्षित मैं पंहुचा दूंगी, मेरा वादा है. अब चलो सीधे से.. क्लॉक  रूम में लगेज रखते हैं और घूमने निकलते हैं. 
लड़की की जिद के आगे वैसे भी लड़के की एक नहीं चलती थी. दोनों टैक्सी से निकल गए कॉलेज स्ट्रीट की तरफ. 
हल्की  बारिश हो रही थी और लड़की के जिद की वजह से लड़के को टैक्सी लेनी पड़ी थी. वो अकेला रहता तो कभी टैक्सी लेने का ख्याल दिल में भी नहीं लाता. लेकिन लड़की का बस एक ही पॉइंट था. कोलकाता घूमो तो इन पीली टैक्सी में घूमो...वरना मत घूमो. टैक्सी में भी लड़की की गाइडगिरी चलती रही. हावड़ा ब्रिज का इतिहास तक लड़की को मालूम था. लड़का सोचता, ये जरूर दिल्ली और कोलकता  के ट्रैवेल गाइड बुक को रट कर बैठी होगी, वरना क्या ये मुमकिन है कि उसे इस तरह की जानकारी हो शहरों की. वैसे, लड़के को उसकी वो कहानियाँ  जो वो शहरों के बारे में सुनाती थी, अच्छी तो लगती थी लेकिन अब उसकी इन कहानियों में कितनी कहानियाँ  असली और कितनी उसकी मनगढ़ात होती थी ये कह पाना नामुमकिन था. उससे पूछने पर पिटे जाने का खतरा भी था. लेकिन जो भी हो, उसकी इन कहानियों से घूमने का मज़ा दुगुना तो हो ही जाता था. 
कॉलेज स्ट्रीट की सड़कों पर टहलते हुए लड़की उसे फिर से भुतहा कहानियाँ  सुनाने लगी....वही जो नेशनल लाइब्रेरी में घूमते हुए वहां के बारे सुनाया था..उसी के कन्टिन्यूएशन में. लड़की कहती, अगली बार तुम जब आओगे तो हम कोलकता  के सभी हौंनटेड हॉउस घूमने चलेंगे. लड़का थोड़ा चिढ़ते हुए कहा, तुम बस भुतहा कहानियाँ  ही सुनाओ, इतना खूबसूरत मौसम है और तुम्हें बस ये भुतहा कहानियां सूझ रही हैं. लड़की इसपर और भी चिढ गयी.. थोड़ा गुस्सा दिखाते हुए कहती है, “एक बात तो बताओ, तुम्हारी प्रॉब्लम क्या है जी? बचपना करो तो कहते हो, बचपना क्यों कर रही..तुम अब बड़ी हो गयी. देश दुनिया की बातें करो तो कहते हो पकाओ मत मुझे, गॉसिप करूँ तो मना करने लगते हो उसमें भी.. रोमांटिक बातें करो तब तो एकदम शर्मा से जाते हो...और अब भुतहा बातों पर भी तुम पाबंदी लगा रहे हो? तो मैं कौन सी बातें करूँ? तुम्हारी कार और फार्मूला वन रेसिंग वाली बातें जिसकी जानकारी मेरे पास जीरो बटा लड्डू है. तुम ही कहो? लड़की रूठ गयी थी. लड़का उसे मनाने लगा. अच्छा बाबा तुम्हें जो मन में आये वो बातें करो. मैं कुछ नहीं कहूँगा, लेकिन ऐसे मौसम में यूँ रूठो नहीं. लड़की ने बेपरवाही से कहा, “किसने कहा मैं रूठ गयी हूँ. मैं रूठती नहीं तुम्हारी ऐसी बातों से, हाँ गुस्सा भले हो जाती हूँ. तुम बस ऐसे में संभल के रहना, ऐसा गुस्सा जब मुझे आता है तो मुझे अकसर लगता है मेरे हाथों किसी का खून न हो जाए. किसी का से मेरा मतलब तो समझ रहे हो न?”
“हाँ मैडम, समझ रहा हूँ. अब ऐसी बातें की मैंने तो मेरी शामत पक्की है..यही न?” 
“शामत नहीं..तुम्हारी मौत पक्की है...”
बोई पारा में अपनी मानसून प्रिंसेज के साथ टहलना ऐसे खूबसूरत मौसम में ये उसके लिए सबसे यादगार पल था.टहलते हुए अपनी प्रिंसेज के साथ ये प्यारी सी खट्टी मीठी नोक झोंक का भी वो भरपूर आनंद ले रहा था. अपनी मानसून प्रिंसेज के हाथों में हाथ डाल के दुकानों के आगे से गुज़ारना, किताबें देखना उसे बहुत अच्छा लग रहा था. 
लड़की उसे कॉफ़ी हाउस लेकर गयी, जहाँ न जाने कितने बार वो पहले आ चुकी थी. लड़की उसे कॉफ़ी हाउस के इतिहास के बारे में बताती. इस पूरे इलाके के बारे में बताती उसे, जहाँ वो अकसर जब कोलकता  में रहती तो अपने दोस्तों के साथ किताबें खरीदने आती थी. लड़की शायद जान बूझकर लड़के को इस इलाके में लायी थी, सिर्फ तीन वजहों से. पहला तो ये कि लड़के को किताबें पढ़ना बहुत पसंद है और दूसरा ये कि इस मोहल्ले की अधिकतर बिल्डिंग ब्रिटिश राज के समय की हिस्टोरिकल  बिल्डिंग हैं, ऐसे मोहल्ले में घूमना लड़के को हमेशा पसंद आता था. और तीसरी वजह लड़की थी, उसका मानना था इस मोहल्ले से एन्सीएन्ट कोलकता  की खुशबु आती है. 
दोनों के पास समय का अभाव था, कॉलेज स्ट्रीट और उसके आसपास के इलाके वो सही से घूम भी नहीं पाए थे कि लड़का वापस चलने की जिद पे अड़ गया. लड़की का लेकिन और घूमने का मूड था. वो पार्क स्ट्रीट जाना चाहती थी. बच्चों सी जिद करने लगी वो. लेकिन लड़के ने इस बार कड़ा विरोध जताया. लड़की थोड़ी नाराज़ हो गयी.. “शहर मेरा है, मुझे पता है कोई गड़बड़ नहीं होगी, और तुम बेवजह डर रहे  हो”. इस बार लड़का भी पीछे नहीं रहा, उसने भी उसे डांटते हुए कहा, “तुम्हारा क्या है? तुम्हारा तो घर है..ट्रेन छूट जाए तो तुम तो चली जाओगी घर, लेकिन मैं क्या करूँगा? ट्रेन छुट गयी तो क्या टिकट मिलेगी इतनी जल्दी अगले दिन की?”. वैसे तो लड़की की बॉसगिरी लड़के के ऊपर हमेशा चलती थी लेकिन जब कभी लड़की को लड़का ऐसे डांटता तो लड़की थोड़ा सहम सी जाती. बड़े मासूमियत से उसने जवाब दिया.. “मैंने कब मना किया, चलो मेरे घर..रहो वहीँ जब तक तुम्हें टिकट नहीं मिल जाती..इससे अच्छी बात तो मेरे लिए हो ही नहीं सकती न...”. लड़का जैसे एकदम निशब्द सा हो गया. उसने आगे कुछ कहा ही नहीं. 
लड़की को भी एहसास होने लगा कि अब वापस लौट जाना ही बेहतर है, शाम भी हो रही थी और ट्रेन का वक़्त भी. 
वापस लौटते हुए लड़की अपनी एक और ख्वाहिश लड़के से कहने लगी, जो कुछ देर पहले उसने लड़के से कहा था जब लड़के ने उसे थोड़ी डांट लगाईं थी. - “इतनी सारी जगहें हैं इस शहर में जो मैं तुम्हें दिखाना चाहती हूँ, जैसे तुम मुझे अपना शहर दिखाते हो, ठीक वैसे ही मैं भी अपना शहर तुम्हें दिखाना चाहती हूँ. मैं भी चाहती हूँ जिन जगहों से मेरी यादें जुड़ी हैं, जिन जगहों से मुझे बेतरह प्यार है वहां तुम्हें ले जाऊं. दक्षिणेश्वर काली मंदिर का नाम सुना है? नाल्हात्ति कलि मंदिर का नाम सुना है?तारापीठ..अदायपीठ.. ये सब जगह जो दूर है यहाँ से..लेकिन सभी किसी न किसी वजह से मेरे दिल के बेहद करीब. मैं तुम्हारे साथ इन सब जगह जाना चाहती हूँ. मैं चाहती हूँ दुर्गा पूजा के समय तुम यहाँ रहो.. मेरे साथ मेरे शहर का दुर्गा पूजा देखो. और ये सब एक या दो दिन में तो मुमकिन नहीं न...” लड़की को थोड़ा उदास देख लड़के ने उसका दिल रखने के लिए कह दिया देखना ये ख्वाहिश भी हमारी जरूर पूरी होगी, जबकि वो भी जानता था लड़की की इस ख्वाहिश का पूरा होना शायद संभव न हो. 
भगवान् भी उन दिनों अजीब खेल खेलता था. इन दोनों की छोटी छोटी ख्वाहिशें अकसर वो पूरी कर देता था, लेकिन ऐसी कुछ बड़ी ख्वाहिशें थी उन दोनों की जिसे वो एक सिरे से खारिज कर देता था...बिलकुल उन पैरेंट्स की तरह जो बच्चे की हर दिन चॉकलेट  खाने की जिद तो पूरी कर देते हैं लेकिन अगर कुछ बड़ा मांग दे बच्चे तो एकदम से वो मना कर देते हैं. आज की एक छोटी सी ख्वाहिश कि काश एक दिन का वक़्त और मिल जाए, ये पूरी हो गयी लेकिन ये बड़ी ख्वाहिश जो लड़की ने अभी माँगा था, ऐसी और कितनी ख्वाहिश उन दोनों की जो भगवान् एक सिरे से खारिज कर देता था. 
वैसे आज की जो छोटी सी ख्वाहिश भगवान ने पूरी की थी, उसमें उन्होंने एक बड़ा प्यारा सा मॉडिफिकेशन भी कर दिया था. स्टेशन पहुचने पर दोनों को पता चला कि ट्रेन और भी लेट  हो गयी है. हावड़ा से कुछ किलोमीटर दूर बारिश और आंधी तूफ़ान की वजह से कुछ पेड़ पटरियों पर गिर गए थे जिससे लगभग सभी ट्रेनों को रीशेड्यूल किया गया था. इन दोनों की ट्रेन की शिड्यूलींग भी गज़ब तरीके से हुई थी. ट्रेन अब रात के ग्यारह बजे खुलने वाली थी. पूरे ग्यारह घंटे की देरी से. 
दोनों पाँच बजे तक स्टेशन पहुँच  गए थे. ट्रेन इतनी देरी से खुलने वाली थी लेकिन फिर भी लड़की ने घर पर किसी को यह नहीं बताया था कि ट्रेन कितने घंटे देरी से है, सिर्फ फोन करके इतना भर कहा, ट्रेन कुछ घंटे देर हो गयी है. लड़के को आश्चर्य हुआ था...तुमने सच क्यों नहीं कहा? लडकी ने फिर उसी विजयी अंदाज़ में लड़के की और देखा था...बुद्धू...सही सही बोल देती अगर, तो दादा आकर मुझे घर न ले जाते? बड़े दुआओं के बाद  ये पल हमें मिला है, इसे क्यों ऐसे गंवाना? लड़का लेकिन लड़की के यूँ झूठ बोलने से थोड़ा असहज तो था लेकिन लड़की की ये बात भी सही थी. ये पल बड़े दुआओं के बाद मिले हैं हमें. इस पल को ऐसे नहीं गंवाना है. 
हावड़ा स्टेशन पर एक ऐसी जगह है जो लड़के की सबसे पसंदीदा जगह में से एक रही है. हावड़ा स्टेशन का टेरेस, जो बिलकुल खुला सा छत है. इस बारे में लड़की भी नहीं जानती थी. जानती भी कैसे, वो वेटिंग रूम में बैठी ही नहीं थी, आज पहली बार आई थी वो वेटिंग रूम. हमेशा नीचे प्लेटफॉर्म  पर ही बैठकर वो ट्रेन का इंतजार करती थी. और ये टेरेस वेटिंग रूम के दूसरी तरफ था. उसने लड़की को वो जगह दिखाई, ये जताने की कोशिश भी की कि देखो तुम्हारे शहर में तुम्हें ऐसा कुछ दिखा रहा हूँ मैं जो तुमने पहले नहीं देखा. लेकिन लड़की इस बात से ज़रा भी इम्प्रेस नहीं हुई. इसमें कौन सी बड़ी बात है, छत ही तो है ये बस. लड़का जानता था लड़की नाटक कर रही है. वो अपने अचरज मिश्रित उत्सुकता को छुपा लेने में माहिर थी.
टेरेस से गज़ब का व्यू आता था. नीचे एक कतार में खड़ी पीली टैक्सियाँ, सामने खुली हुई हुगली नदी, नदी में चलते स्टीमर्स और दूर हूगली के उस तरफ कोलकता  शहर का नज़ारा. दोनों बहुत देर तक वहां खड़े रहे...लड़की की न जाने कितनी ख्वाहिशें थी. वो उन ख्वाहिशों को एक एक कर के गिनाने लगी. काश हमारे पास कोई स्टीमर हो, हम समुद्र में बस घूमते रहे..कोई न हो हमारे आसपास. ना कोई शोर न कोई  परेशानी. सिर्फ हम दोनों रहे. काश ऐसी ही किसी नदी के पास अपना एक घर हो जहाँ दूर दूर तक बस हम तुम हों, दूसरा कोई और न हो...जहाँ की छत पर वो रोज़ अल्लसुबह अपने हाथों से चाय बनाकर लड़के को दे, और जानबूझकर उसमें चीनी कम डाले. पहली बात तो लड़का उसकी किसी भी बात में खामी निकालने वाला था ही नहीं पर अगर कभी भूले भटके वो बोलेगा, सुनो चाय में चीनी कम है तो वह झट से उसकी चाय का एक घूँट भर कर पूछेगी अब देखो...कितनी मीठी हो गयी न..वो जानती है लड़का ऐसे में अपनी जुबां से नहीं अपनी आँखों से काम लेता है...उसकी मुस्कान होठों से तैरती हुई उसकी आखों में उतर जाती है...और लड़की उसकी उन्हीं झील सी चमकती आँखों में जीवन भर के लिए छिप जाना चाहती थी. 
लडकी अपनी बहुत सारी ख्वाहिशें लड़के को बताती थी...पर ऐसी वाली कुछ ख्वाहिशें अब भी सिर्फ उसके दिल के एक कोने में रखी होती थी..वो नहीं चाहती थी कि उसका ये हसीन सपना जब पूरा हो तो उसके दिल में हल्का सा भी ये ख्याल आए कि लड़का पहले से ही सब कुछ जानता था. 
वैसे लडकी को पूरा यकीन था, लड़का हमेशा की तरह उसके मन की ये बात भी जान-समझ गया है, तभी तो यूँ रहस्मयी मुस्कान खिली है उसके होंठो पर...
लड़की धीरे धीरे गुनगुनाने लगी...

आई है खुशियों का पैगाम लेके बहारें,
ये पल है अपना, इस पल में आओ तकदीर अपनी सँवारे
खाली खाली इस जीवन में प्यार भर ले हम तुम दोनों
दीवाने जो करते अकसर, वो भी कर ले हम तुम दोनों
इन फासलों को आओ मिटा दें, एक दुसरे में खुद को छुपा लें,
इससे पहले कि ये दुनिया हमें आजमाए...
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