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ईद-ए-मिलादुन्‍नबी बिदअत नही "सुन्‍नत" हैं ✔️

ईद-ए-मिलादुन्‍नबी बिदअत नही सुन्‍नत हैवहाबीयों, देवबंदीयों व-अहलेहदीसों को जमात-ए-अहलेसुन्‍नत का ओपन चॅलेंज, पहले हमारे 35 सवालात के जवाबात देने होंगे वरना आपका दावा-ए-हक सरासर झुटा साबित होगा और यह सिर्फ धोका कहलाएगा |..

हर मुसलमान आल्‍लाह तआला के बाद अगर सबसे जियादा किसी से मुहब्‍बत करता है तो पैगंम्‍बर-ए-इस्‍लाम हजरत मुहम्‍मद सल्‍लल्‍लाहु अलैही व-सल्‍लम से करता हैं । इसी का सुबुत हमें ईद-ए-मिलादुन्‍नबी के दिन देखने को मिल्‍ता हैं । जैसे ही ईद-ए-मिलादुन्‍नबी कि आमद होती है । मुसलमानों में एक खुशी कि लहर दौड पडती है । आशिकाने रसुल अपने घरों को सजाते हैं । मोहला दर-मोहल्‍ला भी सजाए जातें हैं । नीज़ झंडे लगाकर अमन-व-सलामती का परचम बुलंद किया जाता है ।

मिलादुन्‍नबी शब्‍द मिलाद से बना है । मिलाद का मतलब पैदाईश है और ईदे मिलादुन्‍नबी का मतलब हुजूर सल्‍लल्‍लाहु अलैही व-सल्‍लम कि विलादत (पैदाईश) पर खुशी मनाना है । चुंकी हुजूर अलैहीस्‍सलाम कि विलादत पर खुशी मनाना हमेशा से ही मुसलमानों का तरीका रहा है और यह बात कुर्आन-ए-करीम व अहादीस-ए-मुबारीका से भी साबित है । हुजूर कि पैदाईश पर सिर्फ शैतान (इब्‍लीस) गम मना रहा था । क्‍यों की हुजूर कि तशरीफ आवरी से पुरी दुनिया मज़हबे हक दीन-ए-इस्‍लाम कि रोश्‍नी से रोशन-व-मुनव्‍वर होनेवाली थी । किसी शायर ने क्‍या खुब लिखा है..

निसार तेरी चहल-पहल पर हज़ारों ईदें रबी-उल-अव्‍वल
सिवाए इब्‍लीस के जहां में सभी तो खुशियां मना रहें हैं

• ईदों कि ईद - ईद-ए-मिलादुन्‍नबी :

12 रबी-उल-अव्‍वल को ईदों कि ईद भी कहा जाता है । क्‍यों कि माहे रमज़ान में कुर्आन-ए-मुकद्स नाजिल हुआ तो वह ईद-उल-फित्र कहलाया और इस महीने में खुद साहिबे कुर्आन (जिनपर कुर्आन नाजिल हुआ वह) हुजूर सल्‍लल्‍लाहु अलैही व-सल्‍लम कि तशरीफ आवरी हुई है । तो यह मुसलमानों कि ईद बल्कि ईदों कि ईद हुई ।

• हुजूर अलैहीस्‍सलाम ने भी मिलाद मनाया :

हुजूर सल्‍लल्‍लाहु अलैही व-सल्‍लम हर पीर के दिन रोज़ा रखकर अपना मिलाद मनाते थे । जब साहाबा-ए-किराम ने आप सल्‍लल्‍लाहु अलैही व-सल्‍लम से रोज़ा रख्‍ने कि वजह पूछी तो आप ने ईरशाद फरमाया.. इसी दिन मैं पैदा हुआ और इसी दिन मुझपर वही (कुर्आन कि आयात) नाजिल हुई । [सहीह मुस्लिम शरीफ].

• साहाबा-ए-किराम भी मिलाद मनाते थ‍े :

जलिल-उल-कद्र साहाबी हज़रत हस्‍सान बिन-साबित रदीआल्‍लाहुअन्‍हु हुजूर सल्‍लल्‍लाहु अलैही व-सल्‍लम कि खिदमत में कसीदाह पढ़कर जश्‍ने विलादत मनाया करते थे । खुद हुजूर सल्‍लल्‍लाहु अलैही व-सल्‍लम हज़रते हज़रते हस्‍सान के लिए मिमबर रखा करते थे ताकी वह उसपर खडे होकर अशआर पढें । हज़रते हस्‍सान के लिए हुजूर सल्‍लल्‍लाहु अलैही व-सल्‍लम ने फरमाया '' आल्‍लाह तआला रूहुल कुद्स (जिब्रईल अलैहीस्‍सलाम) से हस्‍सान कि मदद फरमाए ।'' [बुखारी शरीफ जिल्‍द:1 सफह:65].

• जुलुस -ए- ईदे मिलादुन्‍नबी :

जैसे जैसे ज़माना तरक्‍की करता रहा वैसे वैसे लोग हर चिज़ अच्‍छे से अच्‍छे तरीके से करते रहे । जिस तरह पहले मस्जिदें बिलकुल सादा किस्‍म कि हुआ करती थी आज आलिशान बन गई हैं । पहले कुर्आन शरीफ सादा तबाअत (छपाई) में होता था । अब बहतरीन छपाई के साथ दस्‍तीयाब है । साहाबा-ए-किराम के दौर में महफिलें घरों में मुनक्किद होती थी लेकिन आज बडे बडे इज्‍तेमाआत मुनक्किद होते हैं । जल्‍सा-व-जुलुस कि शक्‍ल में नबी अलैहीस्‍सलाम कि मुहब्‍बत का सुबुत पेश किया जाता है । शैरनी, मिठाई वगैरह तक्‍सीम कि जाती है ।

• इदे मिलादुन्‍नबी पर ऐतराज़ करने वालों से 35 सवालात :

कुछ लोग ईदे मिलादुन्‍नबी और जुलूसे मिलादुन्‍नबी पर ऐतराज़ करतें है । इसे आप उनकी बिमारी कहीए या नबी अलैहीस्‍सलाम से बुग्‍ज़-व-अदावत, लिहाजा इस हवाले से हम उन लोगों से 35 सवालात करतें हैं अगर यह लोग अपने अकाईद-व-आमाल में सच्‍चे हैं तो इन सवालों के जवाबात ज़रूर दें ।

बिरादराने मिल्लते इस्लामिया! हमारी ओर से ये चन्द सवालात आपकी अदालत में एक इस्तिग़ासा है और उन लोगों को दावते फ़िक्र देनी है, जो देवबंदी, वहाबी, अहले हदीस जाकिर नाईक आदि विचारधारा से प्रभावित होकर कुछ मुस्तहब कार्यों (जैसे मिलाद शरीफ़, उर्स, ग्यारहवीं शरीफ़, ईद मीलादुन्नबी के जलसे, जुलूस, झंडे आदि) पर अमल करने को शिर्क व बिदअत और ना जाने क्या क्या कहते हैं और सीधे साधे तथा भोले भाले मुसलमानों को यह कहकर कि "यह सब दौरे रिसालत मआब सल्लल्लाहू अलैहि व सल्लम और दौरे ख़ुलफ़ा व सहाबा अलैहिमुर्रिज़वान में ना थीं" इसलिए बिदअत व शिर्क हैं।

अब इस्तिग़ासा प्रस्तुत करने का मुजिब अम्र यह है कि देवबंदी, वहाबी, अहले हदीस आदि का यह पंथ यदि क़ुरआन और हदीस पर आधारित है, तो उन्हें हर हाल में इस पर बने रहना चाहिए था, यानी जिन चीज़ों का वजूद (अस्तित्व) दौरे रिसालत सल्लल्लाहू अलैहि व सल्लम और दौरे ख़ुलफ़ा व सहाबा अलैहिमर्रिज़वान में ना था, तो इन बातों से उन्हें और उनकी जमाअत को बचना चाहिए था, लेकिन सच्चाई इसके विपरीत है और यह कैसा अंधेर है कि यही बात अगर सुन्नी सहीहुलअक़ीदा मुसलमान करे, तो शिर्क और बिदअत, लेकिन खुद करें, तो सही इस्लाम।

बिरादराने मिल्लते इस्लामिया! हम ये चन्द सवालात आपकी अदालत में वहाबी, देवबंदी, अहले हदीस आदी से कर रहें हैं। वहाबी, देवबंदी, अहले हदीस आदी इन सभी सवालों का जवाब दें। ये रहे चन्द सवालात...

सवाल 1: सिवाए “ईदैन और हज इज्तिमा” के नबी पाक सल्लल्लाहू अलैहि व सल्लम और सहाबा के (ज़ाहरी) युग में कोई सालाना इज्तिमा (वार्षिक सभा) होता था? यक़ीनन नहीं, तो देवबंदी वहाबी और अहले हदीस के सालाना इज्तिमाआत (वार्षिक समारोह) जाइज़ हुए या नाजइज़ (वैध हुए या अवैध)?

सवाल 2: सालाना इज्तिमा (वार्षिक सभा) के लिए जुलूस के रूप में ट्रेनों, बसों, गाड़ियों, कारों आदि में जाना सुन्नत है या फ़र्ज़ या मुस्तहब या वाजिब या बिदअत?

सवाल 3: 23 वर्षीय ज़ाहरी दौरे नुबूवत में (जिस में सरकारे दो जहाँ सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ज़ाहरी तौर पर मौजूद थे) काफ़िरों, मुनाफ़िक़ों ने कई बार गुस्ताखियाँ कीं। क्या उन के विरोध में कोई रैली या जुलूस निकाला गया, तो हवाला (संदर्भ) दीजिए और पूरी दुनिया जानती है कि जब डेनमार्क के अख़बारों में गुस्ताख़ी की गई, तो जहां सभी अहले सुन्नत, हनफ़ी, बरैलियों ने जलसे जुलूस आयोजित किए, वहां वहाबी, देवबंदी अहले हदीस आदि ने भी रैलियां और जुलूस निकाले। अब बताया जाए कि देवबंदियों, वहाबियों और अहले हदीस का ये अमल (प्रक्रिया) शिर्क हुआ या बिदअत?

सवाल 4: (क) 30 वर्षीय ख़िलाफ़ते राशिदा में अगर ऐसी रैली निकाली गई हो, तो हवाला (संदर्भ) दीजिए?
(ख) चारों इमामों में से किसी ने रैली निकाली या भागीदारी की हो, तो मुस्तनद हवाला (प्रामाणिक संदर्भ) दीजिए?
(ग) ऐसी रैली सब से पहले कब और कहाँ निकाली गई, जुलूस किस समय निकला?
(घ) अध्यक्षता किसने की? जुलूस किस जगह से निकल कर कहां समाप्त हुआ?

सवाल 5: हाजी इमदादुल्लाह मुहाजिर मक्की, जो सभी बड़े बङे देवबंदियों के पीर व मुर्शिद हैं, अपनी पुस्तक “कुल्लियाते इम्दादिया” में तह़रीर फ़रमाते हैं कि “मशरब फ़क़ीर का यह है कि “महफ़िले मौलूद” में शामिल होता हूं, बल्कि ज़रिए बरकात समझकर मुन्अक़िद (आयोजित) करता हूँ और क़याम में लुत्फ़ व लज़्ज़त (आनंद और खुशी) पाता हूँ”। (फ़ैसला हफ़्त मस्अला, कुल्लियाते इमदादिया, पेज 80, पंक्ति 4, मक्तबा दारुअशाअत, कराची) के तह़त सवालात यह हैं कि...

(क) यदि “महफ़िले मिलाद” मनाना और सलात व सलाम के लिए क़याम करना बिदअत है, तो हाजी इमदादुल्लाह मुहाजिर मक्की के बारे में आपका क्या फ़त्वा है?
(ख) जो मुरीद, पीर के जाइज़ (वैध) और मुस्तहब कार्रवाई का विरोध करे, ऐसे मुरीद पर क्या फ़त्वा लगेगा?
(ग) आपके अपने बुज़ुर्गों से भी मिलाद मनाना साबित है, तो आप मिलाद क्यों नहीं मनाते?

सवाल 6: इतिहास से साबित है कि ''नबी पाक सल्लल्लाहू अलैहि व सल्लम के जन्म के समय शैतान “जबले अबी क़बेस” पर चढ़कर चिल्लाया। उसको तक्लीफ़ हुई। जबकि पूरी कायनात (ब्रह्मांड) ह़ज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि व सल्लम की विलादत पर ख़ुश थी, यानी केवल शैतान को ख़ुशी नहीं हुई, अब अगर एक सफ़ मिलाद पर ख़ुशी मनाने वालों की हो और दूसरी तरफ ख़ुश ना होने वालों की, तो आप किस सफ़ में खड़ा होना पसंद करेंगे?

सवाल 7: बक़ौल आपके ''नबी पाक सल्लल्लाहू अलैहि व सल्लम की विलादत (जन्म) 8 रबीउल अव्वल को हुई थी, तो आप 8 रबीउल अव्वल को क्यों मिलाद नहीं मनाते?

सवाल 8: क्या मिलाद की महफ़िलों में जाना और तक़रीरें करना बिदअत है?

(क) यदि आपका जवाब हां में है, तो पाकिस्तान इस्लामिक फ़ोरम की मह़फ़िले मिलाद में एह़तेरामुल ह़क़ थानवी तक़रीर (संबोधित) करने क्यों गए? फ़ोरम के मंच से ख़िताब भी किया और उसमें भाग भी लिया। एह़तेरामुल ह़क़ थानवी पर क्या फ़त्वा लगना चाहिए? (देखें, रोज़ नामा जंग, 28 मई 2002)।

(ख) ईद मिलादुन्नबी सल्लल्लाहू अलैहि व सल्लम हम भी मनाते हैं। प्रोफ़ेसर ग़फ़ूर अहमद (जमाअते इस्लामी)। (देखें, रोज़ नामा क़ौमी अख़्बार, 23 अक्टूबर 1989)

नोट: प्रोफ़ेसर ग़फ़ूर अह़मद का संबंध जमाअते इस्लामी से है, जिनका अक़ीदा (विश्वास) है कि मिलादुन्नबी सल्लल्लाहू अलैहि व सल्लम मनाना शिर्क और बिदअत है। अब ग़फ़ूर अहमद पर आप क्या फ़त्वा लगाऐंगे?

सवाल 9: हदीस शरीफ से साबित है कि ह़ज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि व सल्लम हर पीर (सोमवार) का रोज़ा रखते थे। जब आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से इसका कारण पूछा गया, तो आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फ़रमाया। इस दिन मेरी विलादत (जन्म) हुई। (मिश्कात शरीफ़, पेज 179, क़दीमी कुतुब ख़ाना, कराची)।

क्या कभी देवबंदी और वहाबी अहले हदीस आदि ने ह़ज़रत मोहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि व सल्लम की इस सुन्नत पर अमल किया और करवाया कि पीर (सोमवार) के दिन रोज़ा रख कर मिलाद की ख़ुशी में अल्लाह की ईबादत के लिए रोज़ा रखा जाए? अगर मिलाद शरीफ़ के मुन्किरों ने इस बारे में कोई फ़त्वा दिया हो, तो हवाला (संदर्भ) दीजिए।

सवाल 10: मुसलमान हर साल नियमित रूप से मिलाद मनाते हैं, जिस पर पूछा जाता है कि मिलाद मनाना फ़र्ज़ (अनिवार्य) नहीं, तो इतना इल्तिज़ाम (पालन) क्यों किया जाता है? इसी दृष्टिकोण से आप से यह सवाल है कि वुज़ू में गर्दन का मसाह करना फ़र्ज़ है या वाजिब या सुन्नत या मुस्तहब? मुस्तहब है और वास्तव में मुस्तहब है, तो इसका इतना इल्तिज़ाम (पालन) क्यों है कि आपकी जमाअत का हर फ़र्द, हर वुज़ू में, हर बार गर्दन का मसाह पाबंदी से करता है और वह भी दैनिक, ऐसा क्यों ?

सवाल 11: बारहवीं की निसबत से बारहवां सवाल यह है कि कुरआन और हदीस या चारों इमामों में से किसी एक का कोई हवाला (संदर्भ) दीजिए, जिसमें लिखा है कि “मिलाद मनाना बिदअत और हराम है”?

सवाल 12: यौमे आज़ादी (स्वतंत्रता दिवस) हिन्दुस्तान व पाकिस्तान मनाना बिदअत है या मुबाह या हराम?

सवाल 13: हिन्द व पाक की नेशनल असेंबली में जब राष्ट्रीय गान पढ़ा जाता है, तो उसके सम्मान में सारे मंत्रियों सहित, आपकी जमाअत के लोग सब खड़े हो जाते हैं। क्या यह शिर्क हुआ या बिदअत? ज़रा दो पंक्तियों का फ़त्वा दिजिए और नेशनल असेंबली में पेश किजिए।

सवाल 14: यह बताइए कि मस्जिद की तामीर (निर्माण) के लिए ग़ैरुल्लाह से मदद मांगना उचित है या नहीं? अगर उचित है, तो ग़ैरुल्लाह से मदद मांगना तो बक़ौल आपके नाजाइज़ (अवैध) है, और अगर जाइज़ नहीं, तो सारी मस्जिदें, जो सेठों से मदद मांग मांग कर बनाई गई हैं, इनमें नमाज़ पढ़ना जाइज़ (वैध) है या नाजाइज़ (अवैध)?

सवाल 15: “नमाज़ की नियत ज़बान से करना” किसी भी सहाबी से साबित हो, हवाला दीजिए, अगर ऐसा हवाला नहीं, तो ज़बान से नीयत करना बिदअत है या शिर्क?

सवाल 16: दुनिया में कई नई चीज़ें ईजाद हो गई हैं, उनका उपयोग करना जाइज़ है या नहीं? हालांकि सहाबियों के दौर में उनका नाम व निशान तक नहीं था, अगर प्रयोग करना जाइज़ है, तो किस नियम के तेहत? जैसे रेल, मोटर कार, हवाई जहाज़, टेलीफोन, मोबाइल, रेडियो, लाउड स्पीकर आदि। क्या कोई देवबंदी वहाबी, अहले हदीस आदि बिना इन बिदआत के आसानी से सांसारिक जीवन बिता सकता है?

सवाल 17: इमामत और मोवज़्ज़नी के पैसे लेना जाइज़ (वैध) है या नाजाइज़ (अवैध)? क्या नबी पाक सल्लल्लाहू अलैहि व सल्लम ने इमामत की वेतन ली है? क्या हज़रत बिलाल ने मोवज़्ज़नी की वेतन ली है? मुअतबर हवाला (विश्वसनीय संदर्भ) दें।

सवाल 18: नबी पाक सल्लल्लाहू अलैहि व सल्लम और सहाबा अलैहिमुर्रिज़वान के ज़ाहरी ज़माने में ज़कात आदि सोना, चांदी, दिरहम व दिनार में अदा की जाती थी। हालांकि वहाबी, देवबंदी, अहले हदीस रियाल, डॉलर और रुपये आदि की सूरत में ज़कात लेते हैं और देते भी होंगे। तो क्या यह बात नबी पाक सल्लल्लाहू अलैहि व सल्लम और सहाबा-ए-किराम का विरोध नहीं कहलाएगी? यदि नहीं, तो क्यों?

सवाल 19: वहाबी, देवबंदी, अहले हदीस, तबलीग़ी जमाअत, जमाअते इस्लामी, मजलिसे अहरार, मजलिसे ख़त्मे नबूवत, सिपाहे सहाबा, जमीअत उलमा-ए-इस्लाम, लश्करे तैबा, अल्क़ायदा आदी। क्या इस तरह की जमाअतों (पार्टियों) का सहाबा-ए-किराम के दौर में वजूद (अस्तित्व) था? यदि नहीं, तो इनको कौन सी बिदअत कहेंगे ?

सवाल 20: सीरतुन्नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम कांफ़्रेन्स, मोहम्मदुर्रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम कांफ़्रेन्स, सैय्यदुल्बशर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम कान्फ़्रेन्स, ख़त्मे बुखारी शरीफ कांफ़्रेंस, दौर-ए-हदीस कान्फ़्रेंस आदि, क्या सहाबा-ए-किराम ने ऐसी कान्फ़्रेसों को और ऐसे नामों से आयोजित किए हैं? यदि नहीं, तो ये सारे काम आपके नज़दीक क्या हैं, शिर्क या बिदअत? तथा देवबंदी, वहाबी और अहले हदीस ऐसी कांफ़्रेस करके और ऐसे नाम रखने से क्या ठहरे? मुशरिक या बिदअती?

सवाल 21: भारत के दिल्ली से और पाकिस्तान के राय विंङ से तीन दिन, दस दिन, चालीस दिन के चिल्ला के लिए, बोरिया बिस्तर बांधकर, चाय दानी, स्टोव और नसवार की डिबया लेकर, परिजनों के अधिकार पीछे डाल कर, घर से निकलना सुन्नत है या बिदअत? तथा ऐसा करने वालों के बारे में क्या हुकम (आदेश) है?

सवाल 22: स्कूल और मदरसों में बच्चों को छह कलमें, उनके नाम और उनकी तरतीब ह़ुज़ूर अक़्दस सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम और सहाबा अलैहिमुर्रिज़वान से साबित नहीं, लेकिन इसके बावजूद आप लोग ख़ूद भी पढते हैं और अपने स्कूलों व मदरसों में बच्चों को पढाते भी हैं, तो क्या यह काम सुन्नत है या बिदअत?

सवाल 23: निकाह के वक्त इमाने मुफ़स्सल और इमाने मुजम्मल पढ़ाना, किस सहाबी की सुन्नत है? अगर किसी सहाबी से इस तरह साबित नहीं, तो आप लोग इस अमल (प्रक्रिया) को क्या समझ कर करते हैं? सुन्नत या शिर्क या बिदअत?

सवाल 24: कुरआन शरीफ़ को किताब की शक्ल में जमा करना सहाबा से साबित है, लेकिन हदीसे पाक को किताब की शक्ल में जमा करना किस का तरीका है? क्या यह काम जाइज़ (उचित) हुआ या बिदअत? अइम्म-ए-मुहद्दसीन के बारे में आपका क्या ख़्याल है? तथा आपके मक्तबों के बारे में क्या हुकम है?

सवाल 25: अपने इज्तिमा में नारा लगवाने के लिए शब्द “नार-ए-तक्बीर” कहना, तो ऐसा कहना यानी… “नारा-ए-तक्बीर” कहना, यह शब्द ना तो कुरआन में और ना ही हदीस में कहीं आया है, तो इस जदीद शब्द से नारा कहलवाना जाइज़ (वैध) होगा या बिदअत? और सारे देवबंदी, वहाबी, अहले हदीस नारा-ए-तक्बीर अपने जलसों (सभाओं) में लगाकर बिदअती हुए या नहीं? हुए यक़ीनन (निश्चित) हूए। अब "कुल्लु बिद्अतिन ज़लालह" वाले क़ायदे (नियम) का क्या हुआ?

सवाल 26: मस्जिदों पर मुरव्विजा मीनार बनाना कुरआन व हदीस के ज़ाहरी शब्दों से साबित नहीं, लेकिन सभी वहाबी, देवबंदी, अहले हदीस मीनार बनवाते हैं और जो अमल कुरआन और सुन्नत साबित ना हो और कोई करे, तो वह क्या कहलाएगा?

सवाल 27: हदीस शरीफ में ऊंट, गाय, बकरी, दुम्बा जानवरों (पशुओं) की क़ुर्बानी का उल्लेख है और उनके दूध पीने का जवाज़ (औचित्य) है, लेकिन भैंस का उल्लेख नहीं, तो भैंस के दूध, दही, घी, लस्सी आदी का क्या हुक्म है और प्रतिदिन भैंस का दूध, दही, घी, लस्सी आदी पीते और खाते हैं, तो आप पर क्या हुक्म (आदेश) लगना चाहिए? तथा हलाल कैसे कहलाएगा?

सवाल 28: हदीस शरीफ में ऊंट, गाय, बकरी, दुम्बा जानवरों (पशुओं) की क़ुर्बानी का उल्लेख है और उनके दूध पीने का जवाज़ (औचित्य) है, लेकिन भैंस का उल्लेख नहीं, तो भैंस के दूध, दही, घी, लस्सी आदी का क्या हुक्म है और प्रतिदिन भैंस का दूध, दही, घी, लस्सी आदी पीते और खाते हैं, तो आप पर क्या हुक्म (आदेश) लगना चाहिए? तथा हलाल कैसे कहलाएगा?

सवाल 29: देवबंदियों के शिक्षण की प्रसिद्ध पुस्तक “तबलीग़ी निसाब” जिसका नाम बदलकर “फ़ज़ाएले आमाल” रखा गया है, इसमें लिखा है कि ''अगर हर जगह दुरुद व सलाम दोनों को जमा किया जाए, तो ज़्यादा बेहतर है, यानी बजाए अस्सलामु अलैक या रसूलल्लाह के, अस्सलातु वस्सलामु अलैक या रसूलल्लाह यानी सलात का शब्द भी बढ़ा दिया जाए, तो बेहतर है''। (देखें फ़ज़ाएले आमाल, अध्याय फ़ज़ाएले दुरुद, पेज 23, मक्तबा मोहम्मद अब्दुर्रहीम ताजिरे कुतुब, लाहौर। क्या इस पर अमल करना चाहिए? अगर नहीं, तो यह मुनाफ़िक़्त (पाखंड) क्यों?

सवाल 30: ये दो शेर बिदअत हैं या शिर्क?

मेरी कश्ती पार लगा दो या रसूलल्लाह।
(हाजी इमदादुल्लाह मुहाजिर मक्की, कुल्लियाते इमदादिया, पेज 205, दारुलअशाअत, कराची)।

या रसुलल्लाह बाबुका ली।
यानी... ऐ अल्लाह के रसूल, तेरा दरबार मेरे लिए है।
(अशरफ अली थानवी, नशरुत्तय्यब, पेज 164, दारुल्अशाअत, कराची)।

सारे देवबंदी मिलकर जवाब दें कि हाजी इमदादुल्लाह मुहाजिर मक्की साहब और अशरफ अली थानवी साहब के बारे में क्या हुक्म (आदेश) है, बिदअती होने का या फिर मुशरिक होने का?

सवाल 31: कुरआन व हदीस तथा अशरफ अली थानवी से (नशरुत्तय्यब में) नबी पाक सल्लल्लाहू अलैहि व सल्लम की नूरानीयत साबित है। कुरआन व हदीस को मानने वाले नबी पाक सल्लल्लाहू अलैहि व सल्लम की नूरानीयत के क़ायल हैं, लेकिन अशरफ अली थानवी के मानने वाले मुन्किर हैं। अब जो अशरफ अली थानवी की बात को ना माने, तो उस पर क्या फ़त्वा है, तथा अशरफ अली थानवी साहब के बारे क्या में इर्शाद है?

सवाल 32: मुर्दों को ज़िंदा किया और ज़िन्दों को मरने ना दिया। इस मसीहाई को देखें ज़रा इब्ने मरियम।।

फ़तावा रशीदीया के लेखक यानी रशीद अहमद गंगोही जो ख़ुदा नहीं, गैरुल्लाह है, उनके लिए यह शेर कहना कैसा है, कुफ़्र या शिर्क?

सवाल 33: जो व्यक्ति खुद को वहाबी, देवबंदी, अहले हदीस कहे और आपकी जमाअत भी खुद को वहाबी, देवबंदी, अहले हदीस जमाअत कहलवाती है। क्या किसी सहाबी ने खुद को वहाबी, देवबंदी, अहले हदीस कहा था?

सवाल 34: सद साला जश्ने देवबंद, के तहत कुछ सवालातः
सद साला जश्ने देवबंद, भारत में मनाया गया था। इसमें पुर्व भारतीय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को अध्यक्षता के लिए बुलाया गया था, तो सवाल यह है कि...

(क) सद साला जश्ने देवबंद, मनाना जाइज़ था या हराम?
(ख) हिंदू महिला को सभा में बुलाकर और फिर उसे अपने से आगे बढ़ाकर, दुआ मांगना जाइज़ था या नाजाइज़?
(ग) क्या हिन्दू महिला को इज़्ज़त मआब कहकर जश्ने देवबंद में संबोधित करना जाइज़ था या नाजाइज़?
(घ) जश्ने देवबंद में 75 लाख से अधिक राशि ख़र्च करना जाइज़ था या इसराफ़?
(ङ) नंगे सिर, नंगे मुंह, बरहना (निर्वस्त्र) हाथ महिला के साथ देवबंदी मौलवियों का बैठना जाइज़ था या नाजाइज़?
(च) सभा में हिंदू महिला को बुलाना मुसलमानों का तरीक़ा है या काफ़िरों का?
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(देखें रोज़ नामा मशरिक़, नवाए वक़्त, लाहौर 22-23 मार्च, 1980, रोज़ नामा जंग, कराची, 3 अप्रैल, 1980, रोज़ नामा जंग, रावलपिंडी, 2 अप्रैल, 1980)

नोट: मज़ार की नफ़ी करने वालो! अपने करतूतों को देखो! मिलाद शरीफ और औलिया के बुग़ज़ (कपट) के कारण आपका क्या अंजाम हुआ?

सवाल 35: नबी पाक सल्लल्लाहू अलैहि व सल्लम के ईल्मे मुबारक को मआज़ अल्लाह, चौपायों (पशुओं) के साथ मिलाना (देखेः हिफ़्ज़ुल इमान, थानवी की गुस्तख़ाना इबारात, पेज 13, क़दीमी कुतुब ख़ाना, कराची) और नमाज़ में नबी पाक सल्लल्लाहू अलैहि व सल्लम के ख़्याले मुबारक को बैल और गधे के ख़्याल से अधिक बुरा बता देना, (देखेः सिराते मुस्तक़ीम, पृष्ठ 86, फ़सल सोम, मतबुआ मुजितबाई, दिल्ली) ये नबी पाक सल्लल्लाहू अलैहि व सल्लम की शान में गुस्ताख़ी है या नहीं? अगर है और यक़ीनन है, फिर अशरफ अली थानवी और इस्माइल देहलवी क्या कहलाऐंगे, जिन्होंने ऐसा गुस्तख़ाना फ़त्वा दिया?

अब अल्लाह तआला का इर्शाद सुनिए।
अनुवाद: बहाने ना बनाओ, तुम काफ़िर हो चुके, मुसलमान होकर।
कुरआन पारा नंबर 10, सूरे तौबा, आयत नम्बर 66,

बिरादराने इस्लाम! हम ने वहाबी, देवबंदी अहले हदीस आदि से 35 सवालात किए हैं। यूं तो हम और भी सवालात क़ायम करते। आप वहाबी, देवबंदी अहले हदीस आदि से इन में से एक एक करके सवालों के जवाब लिजिए और इनसे पुछें कि इत्‍नी बडी गुमराही के बावजुद यह किस दीन कि तबलीग कर रहें हैं ।

सौजन्य - the sunni muslim
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