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स्वामी विवेकानन्द के 3 प्रसंग - Prerak Prasang of Swami Vivekananda

हम छोटों से भी सीख सकते हैं


स्वामी विवेकानन्द भारत भ्रमण करते हुए खेतरी के राजा के पास गए। राजा ने उनका बहुत सम्मान किया। राजा को उन्होंने अत्यन्त प्रभावित किया। उनके सम्मान में एक भजन गायिका नर्तकी बुलायी गयी। जब उन्होंने नर्तकी को देखा इच्छा हुई, अब यहाँ से चलें। राजा ने साग्रह उन्हें बैठा लिया। नर्तकी ने गाना शुरू किया, 'प्रभुजी अवगुन चित ना धरो‘ भाव था, ‘हे नाथ! आप समदर्शी हैं, लोहा कसाई की कटार में है, वही मन्दिर के कलश में है। पारस इसमें भेद नहीं करता। वह दोनों को अपने स्पर्श से कुन्दन बना देता है। जल यमुना का हो या नाले का, दोनों जब गंगा में गिरते हैं, गंगा-जल हो जाते हैं।' हे नाथ फिर यह भेद क्यों? आप मुझे शरण में लीजिए।' यह सुनकर स्वामी जी की आँखों से अश्रुधरा बह चली। एक संन्यासी को सचमुच एक नर्तकी के द्वारा अट्ठैत वेदान्त की शिक्षा मिली।

प्रभावशाली भाषण के लिए भाव चाहिए


prerak prasang of swami vivekananda
आज वह शुभ घड़ी आ पहुँची। स्वामी विवेकानन्द देश-विदेश के प्रतिनिधियों के साथ मंच पर विराजमान हैं। हर धर्म के प्रतिनिधि को कुछ मिनटों में अपना परिचय देना है। एक-एक कर प्रतिनिधि उठते हैं, अपना परिचय देते हैं, बैठ जाते हैं, विवेकानन्द भी उठे और प्रथम शब्द उनके मुख से निकला- 'प्रिय, अमरीका के भाइयो एवं बहनो!‘ जैसे ही ये शब्द इनके मुख से निकले सभाकक्ष तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा। कुछ लोग खड़े होकर इनका अभिनन्दन करने लगे। तालियों का स्वर बढ़ता ही जा रहा था। इसका शाश्वत संदेश है- दूसरों को समझो, ग्रहण करो, दूसरों की भावनाओं का आदर करना सीखो। हिन्दू को न बौद्ध बनने की आवश्यकता है, न बौद्ध बौद्ध को ईसाई, सभी धर्म अपनी जगह ठीक हैं। एक-दूसरे को जानने समझने की आवश्यकता है' उन्होंने अन्तिम शब्द कहे,



“Upon the banner in every religion will soon be written instead of resistance- Help and not fight, assimilation and not destruction, harmony and peace and not dissension.”

'भाइयों और बहनों' का पावन सम्बोधन अमरीका वासियों की हृदय को छू गया। दूसरे दिन समस्त अखबारों के मुख्य पृष्ठ पर स्वामी विवेकानन्द का ही चित्र छपा था। रोमां रोलां (Romain Rolland) ने इसीलिए उद्घोष किया, “He had a genius of arresting words and burning phrases hammered out white hot in the forge of his soul so that they trans pierced thousands.”

प्रेरणा कहीं से भी मिल सकती है


पोरबन्दर के एक पंडित ने कहा, 'स्वामी जी, यहाँ भारत में धर्म के अनेक पंडित हैं, यहाँ आपकी बात कौन सुनेगा?' आप विदेश जाएँ। स्वामी विवेकानन्द अमरीका गए। कुछ दिन भ्रमण करते उनकी जमा पूँजी चुक गयी। एक व्यक्ति ने उन्हें वोस्टन जाने का किराया दिया और विश्वधर्म सम्मेलन के एक सदस्य के नाम पत्र भी। वह भी राह में कहीं खो गया। ठण्ड के मारे उन्हें लकड़ी के बक्से में रात बितानी पड़ी। सुबह पैदल ही चल पड़े। थककर एक आलीशान भवन के नीचे बैठकर सोचने लगे अब क्या करूँ? पत्र भी खो गया। धर्म सम्मेलन में प्रवेश कैसे हो? अन्ततः ईश्वर ने उनकी बात सुन ली। उस महल से एक संभ्रात महिला स दिव्य मुख मण्डल वाले संन्यासी को एक टक देख रही थी। उसने इन्हें ऊपर बुलाया। यह श्रीमती एच. डब्ल्यू. हैल थी। उनकी पहुँच इस विश्व सम्मलेन के सदस्यों तक थी। बस! स्वामी जी को अनौपचारिक रूप से ही सही सम्मेलन में प्रतिनिधित्व प्राप्त हो गया।
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