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सृजनशीलता को पनपने का अवसर दें - Jawaharlal Nehru



Jawaharlal Nehru Prerak Prasang
एक दिन पंडित जवाहरलाल नेहरू अपने अध्ययन कक्ष में बैठे थे। कभी-कभी उनकी दृष्टि किताब से हटकर तीन मूर्ति भवन के प्रांगण की ओर चली जाती। गर्मी का मौसम था - दोपहर का समय, लू चल रही थी। माली अपने घरों में जा छिपे थे। ठीक इस दुपहरी में एक नन्हा बालक आम के वृक्ष के नीचे खड़ा डालियों से लटके आम की ओर एकटक देख रहा था। वह लगातार उछल रहा था। उछल-उछल कर आमों को पकड़ना चाहता था। आम के फल उसकी पहुंच से बाहर थे। उसने एक तरकीब सोची, कुछ दूर पर बड़े-बड़े पत्थर रखे हुए थे। पत्थर के उन टुकड़ों को वह धीरे-धीरे ढकेलते हुए आम के वृक्ष के निकट लाया। कड़े श्रम के बाद एक पत्थर के ऊपर  दूसरा रखकर वह आम को अपने हाथों से पकड़ लेना चाहता था, लेकिन मात्र दो अँगुल से वे ऊपर हो जाते। बेचारा छू नहीं पाता। अंततः उसने तीसरा पत्थर रखा, अब उसकी आँखें आशा से चमक उठी। धीरे-धीरे पत्थरों की ढेर पर उसने पाँव रखें। अब एक आम उसकी हथेली में आने ही वाला था कि पीछे से जोरों की आवाज आई- कौन है बे? आता हूं।

इतना कहना था कि वह पत्थर से फिसल गया और बालक धड़ाम से धरती पर गिर पड़ा। नेहरू जी ने जैसे ही यह दृश्य देखा उन्हें माली पर क्रोध आ गया। किताब ज्यों-की-त्यों रखकर वे प्रांगण में दौड़े और माली को एक मताचा जड़ दिया जो बालक के कान पकड़े हुए था। नेहरू जी माली को पीटते हुए डाँटने लगे और कहा - ''बदमाश तूने बच्चे की मेहनत नष्ट कर दी। दूसरे दिन माली को प्रांगण से निकाल दिया गया।''

दोस्तों, यह छोटा सा प्रंसग हमें जीवन में सृजनशीलता के महत्व को बताता है। जब कोई किसी चीज़ को पाना चाहता या जिस कार्य को करने में उसे आनंद आता हो, चाहे उसे पाना या करना कितना भी कठीन क्यों न हो; वह उससे भागता नहीं बल्कि उस वस्तु को पाने या उस काम को पूर्ण करने के लिए नए-नए तरिकों को इज़ाद करता है क्योंकि उसका मन उसमे रमा होता है। जिस कारण वह सृजन करता है। सृजनशीलता को नष्ट न करे, उसे पनपने दे।
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