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भाषण का प्रभाव - Madan Mohan Malaviya

Madan Mohan Malaviya Prerak Prasangकालाकांकर के राजकुमार श्री सुरेश सिंह का मालवीय जी के सन्दर्भ में संस्मरण प्रेरणादायक है। उनके ही शब्दों में - 'कैम्बलपुर में शाम को एक सभा का आयोजन किया गया। उस दिन मालवीय जी बोलने के लिए जैसे ही उठे, दर्शकों में से एक वृद्ध मुसलमान सज्जन खड़े होकर बोले, ‘मालवीय साहब, आपसे मेरी एक दरख्वास्त है।' 'कहिये'- मालवीय जी ने नम्रता से कहा। 'क्या आप मुसलमान भाई की एक दरख्वास्त कबूल करेंगे?' वृद्ध सज्जन ने फिर प्रश्न किया। 'क्यों नहीं, आप बतलाइए तो सही‘ ‘तो फिर एक मुसलमान भाई यह अर्ज करता है कि आज आप यहाँ तकरीर न करें।' वृद्ध मुसलमान ने कहा। सभा में सनसनी फैल गयी। हम लोग भी आवाक् रह गये। सहसा मालवीय जी की गम्भीर वाणी गूँज उठी। वे बोले, 'भाईयों! आज मैं आप को खितमत में बहुत जरूरी बात करने आया था, लेकिन हमारे एक मुसलमान भाई का हुक्म है कि मैं आपसे कुछ अर्ज न करूँ। मैं नहीं जानता कि किस वजह से हमारे ऊपर इन्होंने पाबन्दी लगा दी है, लेकिन उनका हुक्म तो मानना ही है। अगर हिन्दू लोग मुसलमान भाईयों का हुक्म नहीं मानेंगे, तो हिन्दुओं का कहना मुसलमान कैसे मानेंगे? और जब तक हिन्दू का मुसलमान से प्रेम नहीं रहेगा, तब तक भाइयों में मेल नहीं होगा। हम लोग स्वराज्य कैसे पा सकते हैं? हम अपने देश की आजादी कैसे हासिल कर सकते हैं?'



मुसलमान सज्जन फिर खड़े होकर मालवीय जी को बोलने से रोकना ही चाहते थे कि मालवीय जी ने उन्हें बैठने का इशारा करते हुए कहा, ''आप ही की बात कर रहा हूँ।' हाँ भाईयों, एक मुसलमान तो भारत माता की दो आँख हैं। मुसलमान छोटे भाई हैं और हिन्दु बड़े। छोटा भाई यदि कोई बात गलत भी कहता है और जिद करता है, तो बड़ा भाई उसको मान लेता है। उसी में उसका बड़प्पन है और यही हर एक परिवार में होता है। बिना इसके एकता नहीं और बिना हिन्दु-मुस्लिम एकता के, बिना भाई-भाई के प्रेम के, आज़ादी कैसे मिल सकती है। मुसलमान सज्जन फिर खड़े हुए, लेकिन मालवीय जी ने फिर उसी तरह बैठने का इशरा करके कहा, 'आप ही की बात कह रहा हूं।' और हिन्दु-मुस्लिम एकता पर फिर उनका भाषण चलने लगा। उस दिन मालवीय जी सवा घण्टे बोले। हिन्दु-मुस्लिम एकता पर उनका अपूर्व व्याख्यान था।
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