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महात्मा गांधी केे दो प्रेरक-प्रसंग - Prasang of Mahatma Gandhi



mahatma gandhi ke do prerak prasang

बाल-प्रेम / Prasang 1


महात्मा गांधी बच्चों से बेहद प्यार करते थे। वे उन्हें पत्र लिखा करते थे। एक बार उन्हें एक बैठक में जाना था। सभी नेता पहुँच चुके थे, लेकिन गांधी जी नहीं आए। नेता चिंतित हो उठे। गांधी जी तो समय के पक्के हैं-क्यों नहीं आए, कहीं बीमार तो नहीं पड़ गए। कुछ लोग दौड़ते हुए गांधीजी के पास पहुँचे। देखते हैं  कि वे एक पुराने बक्से में हाथ डाले कुछ खोज रहे हैं। एक नेता ने कहा - बापू! हम तो घबरा गए थे, लेकिन आप यहाँ अभी क्या कर रहे हैं? गांधी जी ने कहा, ''अभी कुछ दिन पूर्व दक्षिण भारत के एक अछूत बच्चे ने बड़े प्रेम से मुझे अपनी पेंसिल दी थी, वही खोज रहा हूँ, उसी से आज लिखूँगा।'' नेता चकित हो गए।

सत्य का पालन / Prasang 2


महात्मा गांधी के बाल्य जीवन की एक घटना है। कक्षा में स्कूल इंस्पेक्टर जाँच के लिए आए। शिक्षक अंग्रेजी पढ़ा रहे थे। इंस्पेक्टर सभी छात्रों से एक-एक कर पूछते। मोहनदास से उन्होंने 'केटल' शब्द का हिज्जे लिखने को कहा। शिक्षक इशारा कर रहे थे, लेकिन इन्होंने कुछ भी ध्यान नहीं दिया। इन्हें शिक्षक के इंगित पर लिखना असत्य का आचरण लगा। उन्हें जो आता था वही लिख दिया, जो गलत था। इंस्पेक्टर के जाने के बाद शिक्षक ने उन्हें डाँट लगाई, लेकिन इन्हें कोई अन्तर नहीं पड़ा। इन्हें शिक्षक का झूठा व्यवहार अच्छा नहीं लगा।
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